गुलेरीजी की अमर कहानियाँ | Guleriji Ki Amar Kahaniyan

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Guleriji Ki Amar Kahaniyan by चन्द्रधर शर्मा - Chandradhar Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( १४ ) पास किया था, उस साल कुष दिन लिखने की घुन उठी थी | ला कालेज के फ़र्ट इयर में सेकशन अर कोइ की पर्वाह न करके एक 'सुब्रमय-जावन' नामक पोथी क्षिख चुका था | सम लो बकेों ने झाड़े हार्थों ज्षिया था और वषं भर में सन्नह प्रतियाँ बिकी थों। आ्रान्न मेरी कदर हुई कि कोई उसका सराहने- चाज्ञा तो मिला | इतने में हम क्षोग बरामदे में पहूँ चे जहाँ पर कनटोप पहने पंजाबी ढंग को दाढ़ी रखे एक श्रे महाशय कुसो पर बेड पुस्तक पद रहे थे । बल्िका बोली--- *चाचाजी, आज झापके बाबू जयदेवशरण वर्मा बी० ए० को साथ लाई हैँ। इनकी बाइसिकिलन बेकाम हो गयी है। अपने प्रिय ग्रन्थक र से मिलाने के जिए कमला को घन्यवाद्‌ मत दीजिए, दाजिए उनके पम्प भूल आने को !?' बृद्ध ने जल्दी ही चश्मा उतारा और दोनों हाथ बढ़ाकर मुझसे मिलने के लिए पर बढ़ाये । 'कमज्ना, ज़रा अपनी माता को तो बुज्ना ज्ञा। श्राहए, बाबू साहब, झाहए | मुके आपसे मिलने की बड़ी उत्कयद्रा थी। में गुल्लाबराय कमा हूँ। पहले कमसेरियर में हेड क्लकंथा | श्रव पेनशन लेकर इस एकान्त स्थान में रहता हूँ | दो गो रखता हूँ ओर कमला तथा डसके भाई प्रबोध को पढ़ाता हूँ । में ब्रह्मममाजी हूँ ; मेरे यहाँ परदा नहों है। कमक्षा ने हिन्दा मिडिल पास कर लिया है| हमारा समय शास्त्रों के प९ने में बीतता है। मेरी অলঘংলী भोजन बनाती है शोर कपड़ सी लती है ; में उपनिषद्‌ ओर योगवासिष्ठ का तजुमा पढ़ा करता हूँ । स्कूल में जड़के बिगढ़ जते प्रबोधको इसी जिए धर पर पदाताः इतना परिचय दे चुकने पर व्रद्ध ने श्वास लिया | मुझे भी इतना ज्ञान हुआ कि कमला के पिता मेरी जाति के ही हैं। जो कुछ बन्द्रोंने और कहट्दा धा, एसकी ओर मेरे कान नहीं थे--मेरे कान उधर थे, जिधर से माता को लेकर कमक्ा आ रही थी। “झापका ग्रन्थ बढ़ा दट्वी अपूव ह। दाम्पत्यसुख चाहनेवालों के लिए व्वाख रुपये से भी अनमोख्व है । धन्य है झापको | स्त्री को केसे प्रसल्न रखना,




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