मनुस्मृति | Manu Smriti

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Manu Smriti by पण्डित रामेश्वर भट्ट - Pandit Rameshvar Bhatt

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रथमोडध्या यः श्र ( ४० १ फल-फूल वाले जो पकने पर नाश होते हैं, श्लौपय कहलाते हैं। जिनमें फूल नहीं लगता, केवल फल हो लगता है उन्हें वनस्पति कहते हैं। जिनमें फल-फूल दोनों लगते हैं, उन्हें चुद कहते हैं| गुच्छं सुल्म हु विविध तय चणुजञातय: । बीजकारडरुदारयेव प्रताना बल्न्य एवं च ८0 ( छन ) गुर छ और _गुल्म 4 बहुत प्रकार के होते हैं और दूश कोई तो बीज लगाने से होते हैं, कोई शाखा लगाने से होते हैं जौसे प्रताना >६ वह्जी 'यादि 1 तमसा बहुरूपेण बेष्टिता: कम हेतुना । झन्तः संज्ञा भवन्त्येते सुखदुखसमन्विता। ॥४8॥ (४६) इस सब में तमोशुण की अधिकता है, 'झतएव सुख-दु्ख का ज्ञान भीतर ही रहता दै | एतदन्तास्तु गतयो श्रह्मायाः समुदाहताः 1 घोरेजरिमतुभूतसंसारे निव्य' सततयापिनी ॥॥४०॥। (४० ) इस नाशवान्‌ संसार में ब्रह्मा से चींटी पर्य्यन्त नौवों की जो द्शा दे बह हमने आप लोगों से वर्णन कर दी । एवं सब स सुप्ट्येद मां चाचिन्यपराक्रम । श्रापमत्पन्तदंधे भूयः काले कालेन पीडयद्‌ ॥४१॥। (४५१) इस प्रकार श्रह्माजी श्रचिन्त्य पराक्रमी सुकको जिनमें जड़ तता से निरुलदी दै और शाखा चड़ी नहीं होती | न-जिनमें जद एक दै परन्तु रेशे (जड़ के डोरे) बहुत निकलते हैं । , .>९ जिनमें सोत होता दै. यथा लौकी, कुम्ददा आदि. !




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