आदिनाथ - चरित्र | Adinath Charitra

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Adinath Charitra by प्रतापमुनी जी - Pratapmuni Ji

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ष्ट ध ७४2४: 08 ^ ^ ॥ ८ ध © स्रादिनाथ चरित्र € न्द ३७7 इस & टः सकलाहंँतप्रतिष्ठानमधिष्ठानं शिव शियः । भूर्युवः स्वस्त्र्याशानमा्हैन्त्यं प्रणिदष्महे ॥९॥ सारे तीर्दूःेकी श्रनिष्ठा-मदिमाफे कारण, मोक्षे माधार, स्वरम, मत्यं जीर पाताल--हन तीनों खोको के स्वामी “अरिदन्त. पद” का हम ध्यान करते ह । घुलासा--जो “श्ररिदन्त-पट ममस्त तीर्थङ्करो की प्रतिष्टा का कारण $ जो श्ररिन्त मोन या परमपद का श्याश्रय रै, जो स्वर्गलोक, सत्यलोक कर पाताल सोक--दन तीनों छोकों का स्वामी है, हम उसी '्यरिहन्त-पद का ध्यान करने है , श्र्ान्‌ हम ध्रनन्त क्षानादिक अन्दरुनी विशूति ओर ললইলহযা शआयाटि बाहरो विभूति का ध्यान करते हैं।




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