सर्वस्व समर्पण - चारुकी चारुता | Sarvaswa Samrpana - Charuki Charuta

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Sarvaswa Samrpana - Charuki Charuta by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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जवावौहो £ ९९ ५ खर 2 धयाह! कहां हुआ? चढद ग़रीब ठहरी ओर तुम्हारी जातिमें लड़के व्याहके लिये रुपये गिन देने पड़ते हैं। तुमने उसके लिये बर ढंढ़ देनेकी कहा था, इसीसे दो हमलोग निधिन्त हो बैठे थे ।? अमरने छज्ञा और अनुतापके मारे लिए नोचा कर लिया । यह वात तो उखे याद्‌ द्वी नहीं थी ! दोनों जने उस बहुत दिन पदलेके देखे हुए और इस समय पहलेसे भी अधिक दूदे-फूटे हुए मकानमें आये । छुचलछी- पतली ओर मैले कपड़े पदने .हुई विधवा, बीमार हो, सेजपर पड़ी थी | उसके पाख ही वह नन्दी-सी बालिका चार वटी हर्द धी 1 मुस्क्राहट-सरी आं खोपर गम्मीर कारो रेला :लिंचो हुईं थी । सुख मछिन ओर शुष्क था । देखते ही अमरके दिखते एक सर्द आह निक पड़ी । वाछिका उसे देख उछला भौर सड्लोचसे सिमटऋर बैठ गयी । उसके पीछे कपोलॉपर थोडी-सी छाली दोड़ गयो । मरा, ऐसे समयमे भी लज्ला की जाती है? छड़की बड़ी ही भोलो-मालो है ! क्षण-भरके बाद जब विधवा दोशमें आयी, तव देवेन्द्र उसके पास चलछा आया ओर बड़े ज़ोर्से बोछा--चायी ! अमर, आया है |” क्षीण खरसे विधवा बोली--“कहां है १” यही है ।” कहकर देवेन्द्ने अमरको ठेलकर चुढ़ियाके सामने ভা खड़ा किया। अमर विधवाकी रूत्युकी छायासे भरी हुई.




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