आराधनास्वरूप | Aradhana Swroop

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Aradhana Swroop by मुनीम धरमचंद - Munim Dharamchand

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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8 ] दिगंबर जेन । घटने बचने वा संक्रमण होनेयोग्य होह तहां अप्रशस्तोपशम जानना । बहुरि जहां उदय आवने योग्य नही होइ अर स्थिति अनुभाग घटने वधने वा संक्रमण होने योग्य मी नहीं होइ तहां प्रशस्तोपशम जानना । बहुरि तिहां सम्यकत्वप्रकृतिका उदय होते डेशघातिष्पद्धकनिके तत्वारथ श्रद्धान नष्ट करनेकी सामर्थ्यका अमाव है । अर श्रद्धानकृ. चट म अगाढ दोष करि दूषित केर है । जाते सम्थकूत्वप्रकृतिका उदयकै तच््ार्थश्रदधानकै मल उपजावने- मात्रहीका साम्यं ই | तिह कारणत तिप्त सम्यक्त्व- प्रकृतिके देशवातिपना है | तिप्त सम्यकृत्वप्रकृतिक उदय अनुभव करता जीवकै उत्पन्न भया जो तत्वा्थश्रद्धान, सो वेदक- सम्यकृत्व है, इसहीकूं क्षायोपशमिक सम्यकृत्व कहिये है । जानें दशनमोहके सर्वेधातिस्पद्धकनिक्रा उदयका अभाव है लक्षण जाका ऐसा क्षय होतें बहुरि देशघातिस्पद्धकरूप सम्यकृम्वप्रकृतिका उदय होंतें बहुरि तिसहीका वर्तमानसमय संबंधीतें उपरिके निषेक उदयके नहीं प्राप्त भये तिन संबंधी स्पद्धकनिका सत्ता अवस्थारूप हैं लक्षण जाका ऐसा उपशम होते वेदकसम्यकृत्व ! होय है, ताते याहीका दूसरा नाम क्षायोपशमिक सम्यकृत्व है ॥ अब इस सम्यत्तवप्रकृतिका उदयतें जो श्रद्धानके चलादिक , दाष छागे है तिनिका लक्षण कहे हैं । अपने ही “ ने आप्त आगम पदार्थरूप ” श्रद्धानके भेदनिविषं चलायमान हाइ' सो चल है। जैमें अपना कराया हुवा अहंत्मतिबिम्बादिक घिषें “यहू मेरा देवहै”




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