एकता की वेदी पर | Ekata Ki Vedi Par

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
श्रेणी :
Book Image : एकता की वेदी पर - Ekata Ki Vedi Par

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about इन्द्रपाल सिंह - Indrapal Singh

Add Infomation AboutIndrapal Singh

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
ग्रहिसा की विजय १५ ৬ के क्या समाचार है ? भणक इस वार महात्मा गौतम बुद्ध आपको पकडने आ रहे है। ग्रंगुलिमाल वह ढोगी, जिसने अनेक युवकों को अकर्मण्य और भिखारी बना दिया है ”? वह पाखडी, जो अहिसा का उपदेश देकर कायरता का प्रचार कर रहा है ? वह मुझे पकड़ने आ रहा है ” क्या मेरे ही हाथो वह अपना प्राणान्त चाहता है ? भणक . ढोगी और पाखडी न कहिए उन्हे, महाराज ! मैने उन्हे देखा है । उनमे अपूर्व तेज और अद्भुत आकर्षण है । उन्हें देखकर एेसा लगता है कि उनके चरणो मे मस्तक रख दू । प्रगुलिमाल (आ्राकोश से)--कैसी कायरता की वाते करते हो भणक ! इससे तो अच्छा था, तुम मेरे गुप्तचर न होकर किसी की स्त्री होते । वीर पुरुष कभी तीर-तलवार से भी विचलित नही होते, वह तो एक साधारण साधु है । भणक . साधारण साधु नही, महाराज ! देखिए, वे इधर ही आ रहे है । श्रंगुलिमाल . (देखते हुए)--अरे ! यही है वह पाखडी ” देखता हूँ | (कुछ काँपता हुआ) पर यह क्या ? मेरे हृदय में यह हलचल कंसी ? अरे, मैं उसकी ओर आकर्पित क्‍यों हो रहा हूँ ” (क्रोध से) भणक ! हट जा मेरे सामने से ! तूने मे शक्तिहीन वना दियाहै। हट जा । (भणक का गमन) अरे पाखडी साधु ! कहाँ वढा आ रहा है मरने के लिए ? भाग जा यहाँ से अपने प्राणो को लेकर | गौतम (श्रागे बढते हुए)--मै मरने के लिए नही आ रहा हूँ अग्रुलि | मैं मरते हुए को बचाने श्रा रहा हूँ, मैं सोए हुए.




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now