शतकत्रयम | Shatakatrayam

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
10 MB
कुल पष्ठ :
222
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)नीतिशतकप् १। १७` सै यै०--इदानी ससत्ततेः प्रभावं वर्णयति । जाव्यमिति । सत्तङ्गतिः स्रुजनानां समागमः धियः ुद्धेजीडवं मन्दता हरति, वाचि वाण्यां सत्यं सिंचति, मानस्योन्ति दर्ददिराति ददाति, पापमपाकरोति दृरीकरोति. । चेतधित्तं प्रसादयति पतन्नतां नयति । दिककीतिं यकः तनेति विस्तारयति । एवच सत्सद्नतिः पुसां विथ न करोतीति कथय वद् वसन्त-
तिठकाषरत्तमिदम् ॥ २६ ॥भा० टी०--सज्जनोकी संगाते वुद्धिकी मन्दताको नाश करतीदं, वा
णीको सत्यताकी धारासे सीचती है, मानको वढातीई, पापफों दर करदीह,
वित्तको. मरसन्न रखती, ओर चारोयर यको पाती, पिर वतासो
यह् मनुष्यको क्या २ टाम नदीं पहुचाती ॥ २३ ॥दोदा--भडताई मतिकी हरत पाप निवारत अद्भ ।
कीरति सल प्रसन्नता देत सदां सत्सद्घ ॥ २ ॥
जयन्तं ^ २
न्तें ते सुकृतिनो रससिद्धांः कबवीश्वरों: ॥
नस्ति येषौं यरराःकये जरामरर्णजं भयम् ॥ २४ ॥
सं० टी०--अपघरुना रससिद्धकवीश्वरा्णां सर्वेकपलमाह । जयन्तीति । रसु दायं
' दिपु सिंद्धा: परिवृणों: सुझतिनः पुण्यवन्तः 4 सुती पृण्यवान् पन्य ह्यपरः | ते कद्धकविश्रेष्ठा: जयान्ति 'सर्वोत्कर्पेण वर्चन्ते |: ते के, येषां यदाःवाये कीपिरूपदेह जरा ঘন মণেঘ
ताभ्यां जातं भयं नासि । अनुष्टवुदरत्तमिदम् ॥ २४. ॥का? टी०--जय होनेसे प्रण्यात्मा प्रयीधरोकी जिनने रसोंक्रो सिझ
किया, भर जिनकी यशरूपी फायाको बुढ़ापे ओर मत्यसे भय नहीं ह॥ २९दोहा-सबसे ऊंचे सुकवि जानत रसको सोत ।
जिनके जसकी देहकी जरासरण नहि होत || २४ ॥सूतुः सच्चारित: सती प्रियतमा स्वॉसी प्रसादोन््मु्खः ।
स्नि््ध॑ मिन्रेंसवर्शकः परिजनों निःछेशलेशी मरने
आकौरो रुचिरें: स्थिरश्व विभेवो विद्यावर्दोत मुखम।
तुँट्टे विएपह।रिणीएदहेरी संप्राप्येते देहिनी | २५ ॥
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