शास्त्रार्थ पानीपत भाग 2 | Shastrartha Panipat Bhag 2
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
6 MB
कुल पष्ठ :
184
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)^ जेनसमाज फा-पत्र' नं० १
प्रकार की हैं कि इनमें शब्द, अथे,' खंवन््ध, पद-ओर अत्तरी/का
जो कम वर्चमान “है उसी प्रकार का क्रम लव दिन बना रहती
दै? (ऋगेदादिं भाष्य भूमिका लफा:रं८) | शब्द् रूप आंगम के
साक्षात् भतिपादन का दुखरा आश्रय न होने से यदह चात.
विरुद्ध भी नहीं क्योंकि जैन तो्थंडरों के अतिरिक्त ऐला कोई
नदीं जिससे किःदस बात की सम्भावना हो । आर्य॑लमाज के
परमात्मा कै अतिरिक्त तो किसी भी धमं धवतेकः को आर्य-
समाज ने .शब्दात्मक आगम का साक्तात् प्रतिपादक माना
नहीं है, अतः उनमें तो यह देतु जातः नदीं है । यव र्द जातो
हे आयसमाज के परमात्मा की वात ल्ली उलमे मी यह साधन
नहीं जाता, क्योकि आर्यसमाज का परमात्मा अश्वसेसे ओर
सर्यव्यापक है 1 अतः उससे शब्द सुप आगम का. धत्तिपादन
नरी दो खकता । शब्द् .जन्य है यह बात आ्यंसमाज के निम्न-
लिखित. मान्य शास्त्रों से प्रमाणित है: |
( १) सतोलिझ्ञाभावात् २--१--२६ बे० दर्शन । नित्य
वैधस्यीत् २--२--२७ चैं० दृर्शन । अनित्यश्यायं कारणतः
२--२--२८ थै० दशन । न था सिद्ध विकारात् २--१--२९
दै दुन 1 अभिव्यक्तौ दोषात् २-२-३० वै० द्रन । अथीत्
शब्दं अनित्य है अन्तराल ले->नाश और उत्पत्ति: के बीच में
उरूकी मौजूदगी.को घतलाने वाले साधंन के अभाव होने से,
शब्द अनित्य है नित्य.ले उलटा होने से; शब्द अनित्य है
फारण:-वाला होने से। शब्द का अनित्यत्व अखिद्ध नहीं उसमें
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