भक्तियोग | Bhaktiyog

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Bhaktiyog by श्री अश्विनी कुमार दत्त - Shri Ashwani Kumar Dant

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रार्थना या १. सोक्षकी घाषिकों भी चह तुच्छ समझता है । केवल प्रभुपापिकी ही आकांक्षा इस हृदयको होती हैं। की भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं.--“जिसने अपनी आत्मा मुझ. अपंण कर दी है, उसे न ब्रह्मासनकी आकांक्षा रहती है, ने. इन्द्रासन की, न. चंद अखिछ चिंश्य सवार हता है; न पाताल स्वामित्वको | यहांतक कि, वह पूवजन्मसे छुट- कारा पानेकी थी आकांक्षा नहीं रखता | अन्य किसीकी न इच्छा नहीं होती ! श्रीमदुभागवत स्कंघ ११ अध्याय १४ ) भक्तसाज रामप्रसादने सत्य कहा है - “भक्ति महारानी सुक्ति उसकी दासी । जिस मनुष्यका हृदय प्रभुभक्तिके रससे परिपूर्ण है, ज्ञिसके हृदयमें पशु भक्ति रूपी




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