सामवेद शतकम | Samved Shatkam

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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क ¢ १ है है है हैहै १ । १ । € है ¶ ¢ | १4७-६२ 0 ६यज्ञों का होता ३शब्दार्थ:--हे (अगन) ज्ञानखरूप परमात्मन्‌ । आप ( विश्वेषां यज्ञानाम्‌ ) त्रह्च यज्ञादि सच ¢ यज्ञो के (दोता ) प्रहण करने নাউ জামী ই। †आप ( देवेभिः) विद्धान्‌ भक्तों से (मानुप जने) मुष्यचग मे (हितः) धारणं किये जाते हं । मावार्थः--आप जगत्पिता सव यज्ञो के अहण करनेवाछे, यज्ञों के खामी हैं, अर्थात्‌ श्रद्धा से किये यज्ञ होम, तप, नहाचये, बद- पठने, सत्यभापण, ईश्वर-भक्ति आदि उत्तम उत्तम काम आप को प्यारे हैं। मनुष्य जन्म में ही यह उत्तम कम किये जा सकते हैं और इन श्रेष्ठ कमेहारा, इस मनुष्य जन्म में आप परमात्मा का यथाथे ज्ञान भी हो सकता है । पशु पक्षी आदि अन्य योनियों में तो आहार, निद्रा, भय, रागहेषादि ही वर्तमान हैं, त् इन ॥ है“७७/२७/७३०७ 4७७२० “<४३-“< “९.कि 0 होन वोर পপ সখা পপ




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