भाषालोचन | Bhashalochan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[{ ठ अध्याय ९ वावर्यमिं श्रार्‌ हुए शब्दे दो सम्बन्ध : अर्थार्मे उल्वट-फेरडे प्रकार : शब्दशक्तिः गर्दी बाहरी दानयीन : नाम रखनेके ढंग : सामान्य भाव और विशेष भाव : कटं दाया- वाले अर्थोकी खोज : अर्थोर्मे देरफेर दोनेके कारण : भर्थमें खझदल-बदलके कुछ निराले ढंग: व्यक्ति या समानके चलानेसे ही पझ्मर्भोर्मे देस्फेर । ই, लिखावटका भो अर्थ द्ोता दै ( लिखाबट कैसे चलो आर कितने ढगऊी ? ) টা ক ४५३ लिखावद भी संकेत दे: भंटपटकी लिखब दिग्यादरे कवे चल्लीं?: दिखावदङी चार भवस्थाएँ: नागरोकी खिद्घावट पूछ है : लिखावटको च(छ : संकेत-दिव्या : लिखने भौर बोलनेमें भेद । तीसरी पाली [ संसारकी बोलियाँ और उनके बोलनेवाले कहाँ-कहाँ हैं १ ] २. ससारमें बोलियाँ कैसे फैज्ञीं ? ( बोलियॉडा बँटवारा ) ४७३ धंसारकी योक्षियोंदा बेटवारा कैसे क्रिया गया; रूपाधित अरं गोग्राश्नित ( पारिवारिझ ) पर्गोहर्ण : अनादरो धृष्टिसे दोबियेंके दो दंग : ुटन्त ( थोगारमक ) धोबियों करे तोन रूप « ग्रोलियोंड्रे बारद गोश्र: योद़ियोंडे सग्रह गोत्र ।




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