कवि उमापति द्विवेदी विरचित परिणातहरण महाकाव्य का साहित्यिक अध्ययन | Kavi Umapati Dwivedi Virchit Parinataharan Mahakavya Ka Sahityik Adhyyan

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : कवि उमापति द्विवेदी विरचित परिणातहरण महाकाव्य का साहित्यिक अध्ययन  - Kavi Umapati Dwivedi Virchit Parinataharan Mahakavya Ka Sahityik Adhyyan
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about मंजरी वर्मा - Manjari Verma

Add Infomation AboutManjari Verma

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
8.पविच्छकिता का जो भान है इसका आदि कारण आपकी इच्छा है । | समारकी कृति जन्य मलिनता यमुना को और परमपुर्ष की वेत विभति गगा को उनके पदाराधिन्द की प्रेमिका सरस्वती एक मँ मिला रही हि । ? नारायण की मूल प्रकृति त था नारायण की आठ पटरानियों की आठ प्रकृतियाँ के समान कहा गया है ।न्याय तिदातों के अनुसार पारिजयातहरण महाकाव्य में कहा गया है असाध्य মলা के अद्भूत विधान उत्पति, विनाशाली कार्यं दिना कारण नहीं हो सकते । कारण गुणानुरूप ही कार्य सिद्धि प्रतिद्वि है । किसी भी कार्य, के कारणो की लघुता या गुस्ता जीव के -चित्तगत बोधका अनुसरण करती है।वेदात के द्वैतवाद का सिद्वात पारिजातहरण महाकाव्य के तप्तम, तर्ग में बताया गया है जैसे रज्जु में तर्पज्ञान अमात्मक है वैते ही अद्वितीय ब्रहम , 6 में सारा টু प्रपंध अमात्मक है 1 ये अन्नमय कप को प्रचुर मात्रा में उत्पन्न करते हैं । कृष्ण को कायाकी कहा गया है । इस काव्य र्म कुष्ण को निर्लेप अदत बताया गया ই |शाप पथा पय व चर्यः प नयः यः प य अवयः च भ सिः तिः मिः पः चकासति सिनः पो ययः स र) पाः पयत सिः सि पः पी तीमः पा तेः पि भतत मात पावनमि নি রিও এডি यति चदनि चं चलि क्वितिपारिजातहरण महाकाव्य - पंचम सर्म - 15 पारिजातहरण महाकाव्य ~ पंचम লর্ম ৮4৪ पारिजातहरण महाकाव्य - षठ মর্ম - 18 पारिजातहरण महाकाव्य - पँचम सर्गं ~ 7 पह्वदद्गयण महाकाव्य - दषम सर्गं 63, 6५ पारिजातहरण महाकाव्य - तप्तम तमं 38 पारिजातहरण महाकाव्य ~ दषम सर्गं - 20 पारिजताहरणं महाण व्य ~ एकादश सर्गं - 82 पारिजताहरण महा काव्य ~ एकादा तर्ग - 87২০ © = ০১ 0 4 8




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now