शाखा | Shankha

Shankha by दामोदर थानवी - Damodar Thanvi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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बोरुन्दा चिरंजीव कर्मन्दु शिशिर तुम्हें संबोधित करने के बहाने अपने तमाम अदीठ पाठकों को हाजिर-नाजिर मान कर आज पहली बार हिन्दी में उन से बात करना चाहता हूं--मुक्त मन से मुक्त कलम से । जो सच्चाई मेरे अंतस की अतल गहराइयों में सोयी पड़ी थी जिसे अब तक प्रकट करने का कोई औचित्य नही था । पर अब परिचित या अपरिचित विश्वस्त डॉक्टर के तुल्य अपने पाठकों के सामने संकोच से निर्मुक्त होकर कृत्रिम लिवास को परे खिसकाना ही होगा । अन्यथा भीतर-ही-भीतर पमरी हुई यह सुखद पीड़ा हमेशा के लिए असाध्य हो जायेगी । सामान्य सिद्धांत की हवाई बातें न बघार कर अपने अनुभव के कुछ आध-अधूरे सत्य प्रस्तुत करना चाहता हुं । कतई जरूरी नही कि मेरे सिवाय किसी दूसरे लेखक पर यह प्रक्रिया लागू हो । फिर भी मेरे अजीज पाठकों की जानकारी के लिए यह संदिग्ध सच्चाई निहायत जरूरी है नही तो मेरे लिए अब उसे दवा रखना अनुचित होगा जिसकी क्षति से मेरे पाथ+ गी बच नहीं पायेंगे। आखिर अपने लेखक की क्षति पाठकों के लिए ऐसी अपुरित क्षति होती है जिसका खमियाजा किसी भी अन्य लेखक से वसुल नहीं हो सकता चाहे वह कितना ही धाकड़ अपूर्वे या अप्रतिम क्यों न हो । कया तुम विश्वास करोंगे शिशिर कि मेरे अध्ययन व सृजन में ये अ जाने हिन्दी पाठक भी आंशिक रूप से भागीदार हैं जिसकी आत्म स्वीकृति के लिए अब मेरे मन में किसी तरह की दुविधा या उलझन नही है। पर एक बात स्पप्ट कर दू कि मेरी मूल राजस्थानी रचनाओं के राजस्थानी पाठकों व अधिकांश लेखकों की तरह हिन्दी के पाठक भी यदि उसी तरह मेरी कसेली उपेक्षा करते मुझे कोसते फूसफुसाती निन्दा करते तो उन्हें अपने अध्ययन व सृजन का साझेदार हरगिज नही मानता । तुम बरस या डेढ़ बरस पहले बिहार हाजिरहूँ ह मुखड़ा चिज्ी




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