जैन दर्शन आत्मदृव्यविवेचनम् | The Treatment Of Soul In Jail Philosophy

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
9 MB
कुल पष्ठ :
284
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)राकमरेक्षभिभः प्राचार्य:एम० ए०, एल० टी०, साहित्याबाय: ऑऔमहाबीरबिश्यविज्ञापीस्ठय
प्रस्तोता (अ० प्रा०) नई, दिल्ली
संस्कृतविश्वविद्यालय:, वाराणसी दि० ३०-७-१६७३दिल्लीस्थस्य श्रीमहावीरविष्वविद्यापीटस्य जंनदशंनविभागाध्यक्षपदभाजा
पटरिथोपाह्डार्टरमुक्ताप्रसादेन साष्यवसायं प्रणतो “जेनदंन आतमद्रव्यविवेचनयु'
इत्याख्यः शोघश्रबन्धो मयाऽवरोक्रितः । ब, त्मविषयकदुरूहृविवेचनस्यापि सारल्येन समू-
पर्थापनम्, दासंनिकर्वैभिन्न्यस्य निरूपणमित्यादिरवेशिष्ट्यसम्पन्नोऽ्यं प्रबन्धो दशेनाध्ये-
तृणामनुसन्धातृणाञ्च महृतीभूपक्ृति विधास्यतीति इटं विश्वसिमि ।रामनरेकभिशभःश्रध्यक्षः, जनदक्षेनविभागस्य,
वाराणसेय-संस्कृत-विश्व विशालय',३००६-०१ ६७३भारतसवबंकारार्थसाहाय्येन भगवतो महावीरस्य २५० ०तमनिर्वाणमहोत्सव-
प्रसद्भ॑ प्राच्यविद्याशोधअकादम्या शोधग्रन्थमालान्तगंतं प्रकाश्यमानों डा० मुक्ताप्रसादस्थ
'टेरिया' इत्युपाह वस्य “जैनदर्शन आत्मद्रव्यविवेचनम्'”' इत्याख्य: शोधप्रबन्धों जैन-
वाइमयाधारेणाहंंदुदार्श निकसिद्धान्तें: परिपुष्ट आधुनिकविश्लेषणपद्धत्या च ग्रथित आत्म-
स्वरूप निरूपयति । णोधप्रबन्धेऽर्मिन् जेनेतरदशंनीयाऽऽत्म विषयकमान्यतानां समीक्षा-
त्मकविवेचनदिशि जंनीयाऽऽत्मसिद्धान्तानां संशोषिते नूत्ने च परिवेशे प्रस्तुतीकरणम्,
विषयप्रतिपादनपृष्ठभूमौ सबलाभियु क्तिभिर्जेनदर्शनस््य नास्तिकत्वनिरास:, प्राचीनत्व-
साधकप्रमाणानां समविशः, द्रव्यव्यवस्थाया वेज्ञानिकरृष्टयनुबूल सामयिकस्वरूपेण
प्रतिपादनञ्च कृतेवें शिष्ट्यमुपादेयत्वञ्च पुष्णन्ति ।विद्व॒त्परिवारेण समाहतः सन्नयं प्रबन्धों मुक्ताप्रसादं॑ मौतवितर्क: नितरां प्रसीद-
यत्वित्यभिलष माण:---अमृतलाल:
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