शंखनाद | Shankhnad

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Shankhnad by राज बुद्धिराजा - Raj Buddhiraja

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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1‡ शिीखनाद कहा करती। 'वह भोजन नही करेगा, सिर्फ पूजा करेगा, जैसा कि मैं करता हूँ। परिवार के धार्मिक अनुष्ठान तो उसे करने ही पडेंगे।' पिता के कठोर अनुशासन के सामने किसी की कुछ नहीं चली और मूलशकर शास्त्रों के कंठस्थ करने, पूजा करने में लग गया। जैसा कि हम कह चुके है कि पिता कुल की रीति का निर्वाह करने पर बल दिया करते थे- “उसे हर रोज हमारी तरह पूजा अवश्य करनी चाहिए, यही हमारे कुल की रीति है। पिताजी कहा करते। व्याकरण कठस्थ करो ! वेद पढ़ो।' रोज मंदिर जाया कयौ! मूलशकर पिता की आज्ञा शिरोधार्य करता । वह उनके साध मदिर जाता, सत्सग करता और उनके मित्रों से सम्मानपूर्वक मिलता। 'कान खोलकर सुन लो तुम | शिवजी की उपासना ही श्रेष्ठ है, इसलिए वही किया करो ।' और मूलशकर किशोरावस्था तक पहुँचते-पहुँचते यजुर्वेद की संपूर्ण संहिता का पाठ करते-करते, व्याकरण की शबद्रूपावलियों को कठस्थ करते-करते और शिव-पूजा करते-करते वह पिताजी की दृष्टि मे परिपक्व होता जा रहा था। वह अपने परिवार के सदस्यों के साथ शिवजी का व्रत करता, विशेष रूप से शिवरात्रि पर। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इस किशोर बालक को दयानंद वनाने में उसके पित्ताजी का बहुत बड़ा हाथ था। जाने-अनजाने उन्होंने अपने हाथों से पुञ्ञ को गढ़ा, मॉजा चमकाया था। उसकी वाल्यावस्था और किशोरावस्था उसके लिए एक महत्त्वपूर्ण पृष्ठभूमि थी। उप्तकी मानसिकता जागे चलकर उसे लौह-पुरुष बना सकी। अब में अपने पाठकों को टंकारा के उस शिव-मदिर म॑ ले जा रही हूँ, जहाँ मूलशंकर को ज्ञान प्राप्त हुआ था। सन्‌ 1887, टंकारा का एक शिव-मदिर। मंदिर में स्थापित शिव-मूर्ति | उपवास ओर शिव-स्तुति । रात्रि-जागरण । ओम्‌ नम शिवाय, ओम्‌ नमः शिवायः का भजन-कीर्तन चल रहा ठै। भकक्‍्तगण झूम-झूमकर, मस्ती मे ताली बजा-बजाकर कीर्तन कर रहे है। शायद अभी शिवजी दर्शन देगे, इसी आशा से शिवलिंग पर आस्थापूर्वक जल-दुग्ध, मिप्टान्न, फले, पुप्प अर्पितं कर रहे है! श्रद्धा ओर भक्ति का वातावरण है चारो ओर! शिव-स्तुति की गूज आकाश तक पहुँच रही है।




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