कटघरे का कवि 'धूमिल' | Katghare Ka Kavi 'Dhumil'

Katghare Ka Kavi 'Dhumil' by ग. तु. अष्टेकर - G. Tu. Ashtekar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रकेला कवि कटपघरा होता है 11 লল্বমী ঈ भी देखकर समना पडता है । कमी-कमी किसी विचारया भाव कौ स्पष्ट करने ऊ लिए किसी प्रादेशिक क्वि कौ नी उदुषत करना पावश्यक हौ जाता है। संडान्तिक वातो कौ श्रपेला रोचता के भ्राघदद्‌ पर कविता मर्थं स्पष्ट करना अधिक युक्ति-सगत लगता ह ) अपने इन्ही ऋत्रुभवों ने यह प्रुस्तक लिखने में मुझे भारी सहायता वी है । परीक्षा' तक ही इसकी उपयोगिता को सीमित रख कर इसे टीका होते से बचाने का और सँद्धास्तिक समीक्षा के नाम पर सैकडो सम्बद-प्रसम्वद्ध अंद्धर्णो को उद्धृत करने की एकरसता मे इस्ते पूर्णेत मुक्त रखने का मेरा सकरूप रहा है । वस्तुत स्व घूमिल की क्विताआ पर सैं ग्पनी प्रतिक्रियाओं को शब्द-रूष देना चाहता था जिससे घुमिल को समभने-सराहने वालो को अपनी प्रतिक्रियात्रो को इनसे मिला कर देखने का अवसर मिले । इसमे यदि मेरी समझ को कमजोरी की कलई भी खुलतो हो तो कोई चात नहीं । इसीलिए इस पुस्तक का स्वरूप 'झपती प्रतिक्रियाप्नो की एक मुक्त प्रभिव्यक्ति का' रखा गया है $ मैं जानता है कि मेरी ये प्रतिक्रियाए' विद्वान समीक्षकों के लिए कठोर तर झ्ालोचना को असीम सम्भावनाए अपने मे समोयी हुई हैं। मैं उसे सहने को इसी आशा पर तैयार रहुगा कि मेरी इस धुस्तक को पढ़कर मुम्से ही कुछ सोचने-समभने वालो को इसमे शत-प्रतिशत बकवास ते लगेगी । यदि इस पुस्तक से कु पाठको मे स्व॒प्रुमिल की कविताओं में घोडी- सी भी ঘলি उत्पन्न हो जाय तो मुके भ्रपनी सफलता का सुख मिलेगा । इस पुस्तक का शौर्षक 'क्टघरे का कवि धूमिल' भी कुछ ग्रजीव-सा लगेगा। हमने आज तक क्टघरे (या चठघरे या कठरे) का कोशगत प्र्थ 'जगलेदार घेरे या धरः भौर दुमा वडा पिजडा भिसमे जगली जानवर को बन्द करके रखा जाता है! जाना है । प्रध्तुत पुस्तक के शीपक का उक्त प्रर्येवले कटघर से सम्बन्ध विल्कुल नहो है यह कहना श्रात्मप्रयचना होभो । परन्तु यद्‌ कहने अधिक सार्थक होगा तरि दक पर्प काः घनिष्टततर साम्बन्य भूमिल द्वारा कलित कटषरेसे है \ जीवन भर कोटे कचह्री ए चक्कर, कभी वादी झोर बहुत बार ध्रदिदादी के रूप भे, गनि षते क्बि ने करघरा उसे कहा है जो स्यायासन के सामने लकडी का बना झ्र्द्ध वृत्ताकार झौर सिर पर खुला होता है ! जिसमे खडे होकर अभियुक्त और प्रभियोदता ग्रपने* अपने हलफ्पि! बयान देते हैं । जिप्के सामने वकौल खडे होकर जिरह-बहस करते हैं म्ौर जिसमे खडे होकर प्रभियोग को सिद्ध-अप्तिद्ध करने के लिए झाये-लाये-जुटाये गये गवाहो के बयान होते रहते हैं ॥ उक्त कोर्ट क्चहरी के कटघरे से स्व घूमिल खूब परिचित था । मुक्ददमेबाजी उस पर लादी गयो मजबूरी थी। प्रनेक मूठ-मृठ के दोपो-भ्रभियोगो से बरी होने के लिए वह कई वार वटघरे में खडा होकर हलफ्षिया बयान दे चुका भा। परन्तु लगता है उसके बयानो को सुन कट दिये गये फैसलो ने डसके चनम न्याय के प्रति प्रास्‍्था कम और झनास्था प्रविक उत्तन्न की थी ६ इसी- लिए वह 'अझ्रेसा कवि कटघधरा होता है' कहता है । कविता को 'शब्दो की प्रदानत




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