शालिभद्र-चरित्र | Shalibhadra-Charitra

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : शालिभद्र-चरित्र  - Shalibhadra-Charitra
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about अज्ञात - Unknown

Add Infomation AboutUnknown

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
সাবি নলুন্দঘহিল १९७तेरे घर चीजन होतो क्या मेरा घर कोई दुसरा है ।- क्यो इमे न घर का मेज दिया यह्‌ बालक क्या कोइ दुसरा है ॥३६।॥ कह जल्‍दी से यह क्या माँगे उस चीज से इसे मिलाती हे ।मत कहना मूंठी बात ज़रा हम तुमको शपथ दिलाती हैं ।1३७॥ धन्ना ने कहा, कुछ और नहीं यह केवल खीर माँगता है ।प्रर घर दुखरे से मोग माँग खाने को बुश मानता है ॥३८॥ मे अपना प्रण तो पहले ही तुम मत्र बहनो को सुना चुकी ।जो पका हो दुसरे के घर में वह अर्न नखाती बता चुकी ।1 ३९] मर जाऊ चाहे अपने घर पर नहीं मांगने जॉऊँगी ।जब तक जीती बेटे को भी में यही वात सिखलाऊँगी ॥४०॥ 'वस केवल खीर को रोता है? हम खय॑ं अभी लासकती हें ।पर प्रणं तेश और संगम का सुनकर लाने में डरती है ॥४१॥ लेकिन कच्ची सामग्री के लेने का त्याग नहीं तुकको ।चल हम सामग्री देती हैं, ला खीर बना कर दे इसको? ॥४२॥ सुन कहा दूसरी ने इससे यह कथन तुरहारा ठीक नहीं? ।जब जाकर ही यह लावेगी, तब क्या वह होगी भीख नदरी ॥४३॥ यह भिक्लुकती सी खडी रहे, छारे पे ठुम्दारे जाकर के । अभिमान सहित तुम सीतर से, देओ सासप्री लाकर के ॥४४॥ यह देना क्या है, दुसरे को, वे इज्जत करके देना है ।वैसे ही अपनो इज्जत खो, वेङ्ञ्चत दोकर लेना दै ।४५ वि




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now