विपाकश्रुत | Vipakashrut

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Vipakashrut by रोशनलाल जैन - Roshanlal Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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है वे केवल व्यक्तिपरक है। दो अध्ययनों में क्रम-भेद है। स्थानाज़ु में जो आठवाँ अध्ययन है बहु विपाक का सातवाँ अध्ययन है और जो स्थानाहु का सातवाँ अध्ययन है वह विपाक का आठवाँ अध्ययन है । स्थानाऊू में दूसरे अध्ययन का नाम पूर्वभव के नाम के भ्राधार पर “गोन्रास'' रखा गया है, तो प्रस्तुत सूत्र में अगले भव के नाम के श्राधार पर उज्मितक रखा है। स्थानाडु में तीसरे अध्ययन का अंड नामकरण पूरवभव के व्यापार के भ्राधार पर किया ग्रया है तो विपाक में अग्रिम भव के नाम के आधार पर 'पभरनसेन' रखा है । स्थानाङ्ख में नौवे भ्रध्ययन का नाम महसरोदाह भ्राभरक या सहसोदाह है। सहस्रो व्यक्तियों को एक साथ जला देने के कारण उसका यह नाम दिया गया है जबकि विपाक में प्रस्तुत अध्ययन की मुख्य नायिका देवदत्ता होने के कारण प्रध्ययन का नाम देवदत्ता रखा गया है। स्थानाज्भ में दसवें प्रध्ययत का नाम 'कुमार लिच्छई” है। लिच्छवी कुमारो के आचार पर यह नाम रखा गया है जबकि विपाक में इसका नाम “अजू” है जो कथानक की मुख्य नायिका है । विज्ञो का यह मानना टै कि लिच्छवी का सम्बन्ध लिच्छवी वंश विशेष के साथ होना चाहिए । नन्दीसूत्र गौर स्थानाङ्कसूत्र में विपाक के द्वितीय श्रुतस्कन्ध सुखविपाक के अध्ययनों के नाम नहीं झाये है । समवायांग में तो दोनों श्रुतस्कन्धो के अध्ययनों के नाम नहीं है। विपाकसूत्र मे सुखविपाक के अध्ययनों के नाम इस प्रकार है-- (१) मुबाहुकुमार, (२) भद्रनन्दी, (३) सुजातकुमार, (४) सुवासवकुमार, (५) जिनदास- कुमार, (६) धनपति, (७) महाबलकुमार, (८) भद्रनन्दीकुमार, (९) महाचन्द्रकृमार श्रौर (१०) वरदत्तकुमार । समवायाग १* कै पचपनवे ममवायमे उल्लेख टै कि कातिकीकी श्रमावस्या रात्रि में चरम तीर्थंकर महावीर ने पचपन ऐसे अध्ययन, जिनमें पुण्यकर्मफल को प्रदर्शित किया गया है जौर पचपन ऐसे अध्ययन जिनमें पापकर्मफल व्यक्त किया गया था, धर्मदेशना के रूप में प्रदान कर निर्वाण को प्राप्त किया। इससे प्रश्न होता है कि पचपन श्रध्ययन वाने कल्याणफलविपाक अौर पचपन श्रघ्ययन वाले पापफलविपाक वाला श्रागमं प्रस्तुत विपाक आगम ही है या यह आगम उससे भिन्न है ? कितने ही चिन्तकों का यह मत है कि प्रस्तुत आगम वही प्रागम है, उसमे पचपन-पचपन प्रध्ययन थे, पर पैतालीस-पंतालीस अध्ययन इसमें से विस्मृत हो गये है और केवल बीस श्रध्ययन ही भ्रवणेषरहेहै। हमारी दृष्टि से चिन्तको की यह मान्यता चिन्तन मागती है । यह स्पष्ट है कि समवायाग में कल्याणफलविपाक शौर पापफलविपाक अध्ययनों के नाम नहीं है और वह जीवन की सान्ध्यबेला में दिया गया अन्तिम उपदेश है। ग्रागम साहित्य में जहाँ पर श्रमण प्रौर्‌ श्रमणियो कै अध्ययन का वर्णन है वहाँ पर द्वादशागी या ग्यारह अंगो के अध्ययन का वर्णनदै। यदि विपाक का प्ररूपण भगवान्‌ महावीर ने श्रन्तिम समय में किया तो भगवान्‌ के शिष्य किम विपाक का अ्रध्ययन करते, अत यह स्पष्ट है कि श्रन्तिम समय में प्ररूपित कल्याणविपाके पापविपाक के पचपन-पचपन अध्ययन पृथक है । यह विपाकसूत्र नही है । साथ ही यहाँ यह भी स्पष्ट करना झ्रावश्यक है कि समवायाग व नन्दी मे विपाकसूत्र की जो परिचय-रेखा प्रस्तुत की गई है जिसमें बीस अध्ययन का उल्लेख है और उसमें जो पदो की संख्या आदि दी गई है उस संख्या से प्रस्तुत वर्तमान प्रागम की तुलना की जाय तो स्पष्ट है कि उसका बहुत-सा भाग नष्ट हो गया है श्लौर उसका ग्राकार अत्यधिक छोटा हो गया है। पर यह स्पष्ट है कि समवायांग के लेखन व देववाचक के नंदी की रचना करते समय उसका आकार वही रहा होगा। उसके पश्चात्‌ उसमें कमी आई होगी । शोधा्थियों के लिए यह विषय अन्वेषणीय है । १५. समणे भगव महावीरे अन्तिमराइयंसि पणपन्‍नं अज्मयणाइं कललाणफलविवागाई पणपनन ग्रज्भयणाईं पावफलविवागाइ वागरित्ता सिद्धे बुद्ध जाव पहीणे । --समवायांग, समवाय-५५ [१५]




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