नगरी प्रचारिणी पत्रिका (१९७०) ऐसी ४३३२ | Nagri Pracharini Patrika (1970) Ac 4332

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Nagri Pracharini Patrika (1970) Ac 4332 by श्री सम्पूर्णानन्द - Shree Sampurnanada

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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असमिया वैष्शवधर्म का क्रविकास १३ मक्तिरलाकर, भकतिप्रदीप श्रनेक बर गीत एवं अ्रमेक एकांकी भावना नाटथों की रखनाकर वैष्णव साहित्य को विस्तार एवं मानदंड प्रदान ;किया । इनके गुरु कौन ये | कोई गुरु थे अ्रथवा इन्हें भागवत आदि शास्त्रों के मनन द्वारा स्वयं बोध हुआ, यह प्रश्न विवादास्पद ই | पर इतना निश्चित है कि उक्त यु की बढ़ी बड़ी वेष्णव प्रतिभाओं के संपक में ये झाएं। मैथिल पंडित बगदीश मिश्र, জিন্ই' कहते हैं स्वप्न में जगन्नाथ जी ने शंकरदेव से मिलने की श्राज्ञा प्रदान की थी, इनसे श्राकर मिले एवं एक वर्ष तक भागवत पर श्रीघर स्थामी की टीका को सुनाया । दके बाद उक्त ब्राह्मण की मृध्यु हो गई। दूसरे पंडित विध्णुपुरी का नाम भी श्राता ই জিন্ই' इन्होंने 'विध्णुपुरी मोर संगी? अर्थात्‌ बिशुपुरी मेरे मित्र कटकः संबोधित किया है। अतः इनके दीक्षागुर संभवतः कोई नहीं ये, पर सत्संग बहुतों से हुआ | इनके ठिद्धांतों पर भीषर स्वामी की टीका सागबत- সালাখ दीपिका” का पर्यात प्रभाव शात होता है। परंतु बोध अपना ही है। किसी गंभीर समस्या को सुलभाने के लिये किसी की सद्दायता भले ही ली गई हो । सुधारवादी एवं व्यावहारिक बुद्धि होने के कारण किसी भी ख्रोत के पूर्णतः अनुगामी ये नहीं शात होते हैं । इनको शिष्यपरंपरा में सबसे मुरूय व्यक्तित्व है माधवदेव का जो इनके द्वारा उत्तराधिकारी चुने गए थे। श्री माधवदेव भी जाति के फायस्थ हो थे। एक अन्य शिष्य श्री दामोदरदेव जाति के ब्राह्मण ये । माघवदेव ने गुरु के मरने पर कई बातों में मनमानी करनो प्रारंभ की, जो दामो- दरदेव को खली । फलतः धीरे धीरे वे श्रलग होने लगे और श्रंत में खाकर एक नवीन वैष्णत्र मत की स्थापना की--दामोदरिया संप्रदाय । इस नवीन संप्रदाय में शास्त्रों की मर्यादा स्वीकार की गई थी। परंतु माघबदेव के सुधारवादी जोश ने उन्हे' कई स्थलों पर ब्राह्मण गौरव एवं शास्त्रीय मर्यादा को उपेदित करने शे बाध्य किया । फिर भी माधवदेव ने महापुरुषिया संप्रदाय के लिये वही किया जो सारिपुत्र और मौद्गल्यायन ने बौद्ध धमं के लिये किया था। इख नवीन वैष्णवता का मूलसोत था “भागवत महापुराण! | पांचरात्र धर्म के वासुदेव व्यूह के स्थान पर उनके अवतार भीकृष्ण या भीराम की पूछा या विष्णु- लक्ष्मी की पूजा गुतकाल से तो चल ही रही थी इस नवीन उत्थान के युग में वह राष्ट्रीय धर्म बन गई । कामरूप में शंकरदेव ने भ्रीकृष्ण की पूक्षा का ही प्रसार किया । यथपि राम की श्रम्यथना में मी उन्होंने गीत लिखे एवं 'राम विजय नाट!' की रचना ब्रशबोली में की! फिर मी उपाश्य के रूप में श्रीकृष्ण ही मान्य हुए और नारायण के साथ उनका श्रमेद माना गया । इस नवीन साधना का नाम है 'एकशरण घमं । 'एकशरणं श्रर्थात्‌ एकमात्र भीकृष्ण की शरण । अनादि निरंलन परम पुरुष भीकृष्ण की एक




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