रामकाव्यधरा : अनुसंधान एवं अनुचिंतन | Ramkavyadhara Anusandhan Aur Anuchintan

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Ramkavyadhara Anusandhan Aur Anuchintan by भगवती प्रसाद सिंह - Bhagwati Prasad Singh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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साप्रदाविक रामोपासना का प्रवर्तत 5 १३ रामचरित ॐ दर्शेन होते हैं । आरम्भ मे अयोध्या ओर राम की स्तुति करके जाठवें छूट तक सम के राज्याम्पिक की कथा कही गई है | इसके पश्चात्‌ सीता के भू-पवेश का उद्देश्य पृथ्वी में अपने अणुपरमाणुओं को भिलाकर लवबुश वे समान राभयशगायकों को जन्म देना बताया गया है | दसवे छद मे उनकी सेवा मे गण्ड फी नियुक्ति का कारण मत्तो की रसा कही गद है । ग्यारहवें श्वोक में राम के भत्री और दूत हतुमान की बदता की गई है। अन्त में राम का ग्रुणयान करने वाले भक्तो को प्ररम पद कौ प्राप्ति का अपिकारी कहा गया है ।' इस विवेचन से यह सिद्ध हो जाता है कि वस्तुत साम्रदायिक रामभक्ति की उद्भव- स्थली, द्वविड देश के उपर्युक्त आलचार भत्तो की भावसाधना ही है ।* यंष्णबाचार्या' को रामभक्ति देष्णवो के चार सप्रदायो--श्री, सनक, ब्रह्म और रद्--मे रामभक्ति के मूत्र केवल श्रीसंप्रदाप और बहयसप्रदाय, में ही पाये जाते हैँ । उस्फी साप्रदापिक परम्परा भी इन्हों दो के भीतर पललवित हुई । भ्रथम के आदि आचार्य नाथमुत्ति भौर द्वितीय वे भध्व थे । शरीसप्रदाय के श्राचार्थो कौ रामभक्ति गालवारों के उत्तराधिकारी श्रीसप्रदाय के आचार्य हुए। ये उच्चकोडि के विद्धानु होने के साथ ही भक्तिरस के भोत्ता भी थे । आलवारों की माँति इन्होने विष्णु तथा उतके अवतारों मे इृष्ण, वामन और झसिह के साथ रामावतार में भी अपनी ग्रृढ आस्था और तद्विषयक साहित्यरथना में रुचि दिखाई । इसीलिए रामभक्तो में ये पार्षदों के अवतार के रूप में पूज्य हैं।* वैसे श्रीसप्रदाय भे लट्ष्मीनाराग्रण को ही प्रमुश्नता दी जाती है, किन्तु सीताराम की उनसे एकात्मता स्थापित कर इन उदाराशय ओर दीर्घदर्शी महात्माओं ने सम्प्रदाय के भीतर 'रामभक्ति की प्रति एक तद्भुत आवर्पण पैदा कर दिया 1 ₹* মঘলাগুর। সৎ ২২, २. देखिये--'पेदमल्ल--तिद्मुडि” (सं० पो० कृष्णमाचाय्य), पृ० १५४४-४७ ३. भ्रषन्नामृत, धू० ४५०. ४४. थी वंष्णद सप़दाय के एक मुश्य सिद्धान्त प्रस्थ--बृहइश्रह् सहिता' से सीताराम और लक्ष्मोचारायण को अभिन्नता दिखाई गई है-- तत्रायोध्यायुरी रम्या यत्र नारायधों हरिः ।




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