गोम्मटसार (जीवकाण्ड) | Gommatsaar (Jeevkand)

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : गोम्मटसार (जीवकाण्ड) - Gommatsaar (Jeevkand)

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about नेमिचंद्र सिद्धांत चक्रवर्ती - Nemichandra Siddhanta Chakravarti

Add Infomation AboutNemichandra Siddhanta Chakravarti

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
ह गमन्नेमिचन्द्राय नमः। ০২৯১৯ ? अब जवामाषटकापंद गोस्मट्यारः ९५ नन শক্কা ' है जीवकाण्डम्‌ । शिव अ्रनिमिचन्द सैद्धान्तिकचकव्ती म्म সং ভিন দু হী সন ধাম [प रिष्टाचारपरिपारन ओर उपकारप्मरण-इनं चार प्रयोननेपिं ` इदो রর किते हुए इस अन्य नो कुछ वक्तव्य है उम्तकी ५ दद्धं ” इत्यादि মাথা भसेद्धं सुद्धं पणमिय जिणिर হট নিন | ¢ गुणस्यणमूसणुदयं जीवस्स परूवणं वोच्छं ॥ १ 1 पिद शुद्धं प्रणम्य क 0 ~ रणेरतमृषणोदयं जीवस्व प्रपणं वये ॥ 11 # + 9 पिद्ध अवस्था अथवा स्वात्मोपरुन्धिको प्रा्ठ हो चुका है, अथवा व्यायत प्रमाणेति मिप्रकी सतता सिद्ध रै, ओर जो चार धातिया-द्र्यकमके अभावसे शुद्ध, पिध्यात्दि মানি নাহার” অঙ্গ हे कक ই জী সিটি জীবনী (ता गृणरुपी रह्नोके मणोंका उदय रहता है, इस प्रकारके श्रीनिनेन्धवरनेमिच कोः नमस्कार करके, जो उपदेशद्वारा पूवीचाये परम्परासे चला आरहा है इस ढिये हक ओर पूवापर विरोधादि दपेपि रहित हेनेके कारण शुद्ध, ओर दुपरेकी निदा दि न कनके कारण तथा रगादिका उत्पादक न हेनेमे निप्क्डक है, ओर সিল ग गणरूपी रलमष्णोंकी प्राप्ति होती हैलनो विकथा आदिकी तरह रागका कारण 'है इस प्रकारके नीवप्रह्पण नामक अन्यको अथोत्‌ निमे अशुद्धं नीके खट्प परमद आदि दिखलये ই হত সন্ধা দু कहूँ गा।




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now