संत समागम भाग 2 | Sant Samagam Part-2

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
10 MB
कुल पष्ठ :
378
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
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नियम हे कि जिसकी सत्ता भास होने लगती है, उसमे प्रियता
उत्पन्न हो जादी है, प्रियता आते ही अस्वाभाविक परिवतंन-
शील जीवन में आसक्ति हो जातो है, वस यही परतन्त्रता की
सत्ता हं आर इछ नदी । यदि हम खयं अपने ऊपर अपनी
छपा कर, तो निजीव परतन्त्रता स्वतन्त्रता में परिलीन হী
सकती हंहम सबसे बड़ी भूल यही करते हैं कि जो हमसे भिन्न है,
उनकी रूपा की प्रतीक्षा करते रहते ই। भला लिन वेचारों का
जीवन केवल हमारी स्वीकृति के आधार पर जीवित है उनमें
हसारे ऊपर कृपा करने की शक्ति कहाँ ? हम अपनी की हुई
स्वीकृति को स्वयं स्वतन्तरतापूवेक मिटा सक्ते हैँ 1 समी परि-
चतंनशील क्रियाओं का जन्म हमारी अस्वाभाविक काल्पनिक
स्वीकृति के आधार पर होता है | अतः सानी हुई अहंता
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