श्री भागवत दर्शन (खंड २३) | Shri Bhagwat Darshan [ Khand - 23 ]
श्रेणी : साहित्य / Literature
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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
4 MB
कुल पष्ठ :
236
श्रेणी :
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लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)सन्तो के जीवन से उपदेश ११यह कि उनके मन में कभी किसी प्रकार का मान अपमान का
ध्यानं नहीं था । जपने आनन्द मे सदा मग्न रहते । हम जहां
के लिये भी प्रार्थना करते, तुरन्त हाँ कर,लेते ।कुछ लोगों के आग्रह से फटं लावाद में एक महीने के महो-
त्तव का आयोजन किया । मैं वहां की भीतरी बातों से तो
परिचित नहीं था । श्री हरिवाबा उड़िया बाबा दोनों' से प्रार्थना
को, दोनों ने स्वीकोर करली | महाराज को पंदल जाना था।
दैंदल चलकर पहुंचे | वहाँ आपस में ही विरोध हो गया।
ज॑सा चाहिये उत्सव हुआ नहीं । मुझे बड़ी लज्जा छगी। मुझ
भी ज्वर आ गया। आपने कह दिया कोई बात नही, ऐसा तो
होता ही है | सांघुओं के लिये मान अपमान क्या ? प्रसंग बहुत
वडा है, यहाँ मेरे कह्ने का तात्पयं इतना ही है किं भाप अभी
किंसोकेदोपकती ओर ध्यान ही नही देते थे । मान अपमान में
सुख दुख में सदा समभाव से रहते ।
४ 7 जब भूसी में चौदहः महोने.का अखण्ड कीतंन साधनानुष्ठान
हुआ' तव मेने प्रार्थना की 1 ढारईतीन सी कोस, पैदल आना
सामान्य वातत नहीं थी। आपने मेरी प्राथेना सहपं स्वीकार
कर छी और रामघाट. से पैदल'चलकर आप भूसी आ गये।
जहाँ 'तक मुझे स्मरण है, जब से रामघाठ माये तवसे यहो
एक काशी-प्रयाग की उनकी यात्रा सबसे प्रथम और सबसे
अन्तिम थौ यहाँ लगभग दो उाई महीने आपन्ने निवास.किया ।
* जहाँ हमने आपके छियेः फूस की कुटिया' बनवाई थी, इसका
चित्र अभी तक ज्यों .का त्यों मेरी आँखों के आगे नृत्य -कर
रहा है। इस स्थान को देखकर . अबः्सी हृदय भर, आता है।
आप यहां बड़े . ही: प्रसत्तः रहे, ,अत्यन्त “ही अनुराग आपनेहै ই
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