सुदर्शन सेठ | Sudarshan Seth

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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লুলহা परिच्छेद ६ दारमें ठाना आरस्भ कर दिया। जों पुरुष जयगतकों कौ शिक्षा देनेके लिये जन्म श्रहण करते हैं, ये अवस्थामें छोटे होनेपर भी, उनका अन्त:करण सद्‌ उच्च और अतिविशाल होता है । संसारक प्रचलित नियमकरे अनु्लार सदशेन जव युवाच- स्थाको प्राप्त हुआ, तब उसके पिताने उसका विचाह एक कुलीन सेठकी मनोरसा नामकी कन्याके साथ कर दिया । खुदशेन आर मनोरमाके नाम जैसे एक ही तरहके थे, घैसे ही उनकी आत्माए भी मिलकर एक हो गयीं । वे दोनों खी-पुरुप दाग्पत्य-धर्मफे जानने चाले थे। इसलिये थे सांसारिक व्यव- टारमें कमी रसी भर भी नहीं चूकते थे और अन्य स्त्री-पुरुषोंके लिये आदशे बन गये थे । पतिके मनके मुताबिक चछती ओर उनकी प्रेमपात्री बनी हुई मनोरमा आहेत-अर्मेकी आराधना क्रिया करती थ्री। बालकपनसे ही श्रद्धाका शुभ ओर दिव्य संस्कार उसके मानस-श्षेत्रमें गा हुआ था। खुदशंनफे समा. गमसे चद संस्कार आर भी दें द्ीप्यमान होकर उसके श्राविका- धर्म-की पूृर्णताकी सचना दे रहा था। क्‍यों न हो ? जहाँ ऐसे दग्पती हों, वह स्थान चाहें गाज़ाका महरू हो या पत्तोंकी बनी ऋट्िया-- चहाँ सांसारिक खुछ और धार्मिक अभ्युद्य होना, कुछ आश्चर्यकी बात थोड़े ही है? मनोरमाकी मनोहारिणी मर्यादा आर अपनी व्यवहासुझलता तथा न्याय-निष्टाके कारण खुदशेन अपनी जातिमें हो नहीं, सारे नगर और राजद्रवारमें भी दिन-दिन अधिकाधिक सम्मानित होने लगा ।




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