विद्यापति पदावली | Vidhyapati Padawali

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( १३ ) পুগ5 116, ৮886 18 8175865 6০06, 8105 2508208 600০085 909 8850 0 10708 £ [26 85678 88 2£ 1 889 (8 0125705 पा चर 699৮. 06৪. ৪0819 ঘা उक्त पंक्तियों में प्रथम पंक्ति का पाठ तो ठीक है, फेवल अर्थ में अशुद्धि है; किन्तु -दूसरी पक्ति का ही पाठ अशुद्ध है। इसी से अर्थ में भी अशुद्धि हो गई है | शुद्ध पाठ इस प्रकार है-- दाहिन पवन यह से कैसे जुवति सद्द करे कवलित জন্তু ङ्ग | गेल परान आस दए राखए दस नखे चिप জুন ॥ परिप्दू-पदावली, पद्‌-सं० १६४ अ्र्थ--दक्षिण वायु वह रही है। युवती कैसे उतका सहन कर सकती है ? वह वायु उसके अंग की आस वना री है} (विरहिणी) गये हुए. प्राण को आशा देकर रख रही है और दस नखों से सर्प लिखती दै। (अर्थात्‌, सर्प दक्षिण पवन को पी लेगा. तो उसके प्राण बच जायेंगे ।) नेपाल-पदावली की पाण्डुलिपि मे कुछ अक्षर ऐसे अस्पष्ट हो गये हैं, जो अव्तक पढ़े नहीं जा सके थे | वहुत परिश्रम के साथ अधिकराश ऐसे स्थलों का पाढोद्धार परिषद्‌- पदावली में किया गया है। उदाहरण-स्वरूप निम्नलिखित पद पर हकपात कीजिए-- लगेन्द्रनाथ गुप्त का पाठ-- सोदे कुल मति रति कुलमति नारि | बॉके दरशने चुल्ल सुरारि डचितहु चोक्नइते आचे अवधान | ससय मेललहु तन्दिक परान ॥ सुन्दरि कि कददव क्हइते लान । मोर मल्ला से परह सनो वाने ॥ थावर द्म सनहिं अनुसान। सवहिक विषय तोहर दश्च भान ॥ पद्‌ 9০৪ मित्र-मजूमदार का पाठ-- लोहे इल मपि रति তি নাহি वाह दरखने युलल सुरार 11 उचितहु वोजदत श्वे श्रवधान । संसय मेलतह तन्हिक परान ॥




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