राजस्थानी साहित्य कुछ प्रवृत्तियाँ | Rajasthani Sahitya Kuchh Pravritiyan

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Book Image : राजस्थानी साहित्य कुछ प्रवृत्तियाँ  - Rajasthani Sahitya Kuchh Pravritiyan
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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राजस्थानी गद्य की विशिष्ट शेलियाँ भरकी विधि का वर्णान रहता भ्रथवा एसे प्रश्नोत्तर ग्रंथों की रचना होने लगीजिनमे जिज्ञातु प्रश्न करता और श्राचार्य उसका उत्तर देकर जिज्ञासा ब्लान्तकरते । तत्त्वचर्चा श्रौर विधि-विधान को लेकर भी कई ग्रंथ लिखे मये । साधुकोर्तिजयत्तोत, शिव-निधान, समयसून्दर, सतिकीत्ति, संत भीखणजी, जयादय भ्रादि ने स धार्मिक साहिव्य को समृद्ध बनाया]जैनेठर लोगो ने इस प्रकार के धार्मिक साहित्य की मौलिक सृष्टि बहुत रूप की । उन्होने पुराणादि से अनुवाद ही श्रधिक किया | सोलिक रूप मे ब्रत-कंथाएं ही श्रधिक लिखी गई' । इन ब्रव-ऊुथाप्रों पे एकादशी, नुर्सिह-चतुर्द शी, जन्माएमी, 5 रामनीपी, सोमवती-अ्रमावस्था, ऋषि-पंचमी, गणेश-चत्तुर्धी, नाग-पंचमी प्रादि की कथाएं प्रमुख ই ওधाभिक साहित्य प्रधानत. दो शैलियो में लिखा हुआ्आा मिलता है । জলশ্ীলী प्रोर जेनेतर शैली । दोनो गद्य-शेलियो मे इतना अन्तर नही मिलता जितना जैन कवियों श्रौर चारण कवियोकी पद्य दैवियो मे मिलता है। जैन-शैली प्रपेक्षाकृत प्राचीन होने के कारण अपभश्र श से प्रभावित ह जव कि जेनेतर नेली में चलती भाषा का ही प्रयोग हुआ्आा है । उसमे देशज शब्दों को भी समुचित स्थान दिया गया है । इसका एक कारण यह भी रहा कि जैनेतर दौली में यह ध।मिक साहित्य बहुत बाद मे जाकर रचा यया । धीरे-धीरे जच शैली भी श्रपश्र श (के प्रभाव से मुक्त हो रही थी ।१--चौवीसमे बोले समय २ अ्रचंती हानि छे ए वचन सूत्र प्रनुसार छे। पिणं कहणमात्र हीज नहीं छे समय २ एकेक वस्तु ना २ पर्याय घंटे छे । -- प्रश्नोत्तरसाद्ध शतक पत्र २ (ख)२--भादवा-माप्त-श्र धारा पख्॒ री श्राठम प्रावे छु जन्माट्टमी रो बरत राजा प्रभरीख करें छे । राजा बलीप करतो । राजा द्िभीपणा करतो । विजाही बड़ा- बडा राजा जन्माष्टमी रो वरत करे छे। यु इस वरत कीया से इतरो पुन्य छे । कपिला गाय, सोवने सीगी, रूपा खुरी, चाब पुछी तितरो पुन्य हुवे । লী লু कुरखेत माहे सुरज गिरहरा माहे सोनो दीजें, सो भादरबानों दीया रो पुन्य होदे জিজতী पुन्य हुवे + बले जेतराई तीरथ छे, तितरा नायारो फल हुवे, इतरो फल छै । -- राजस्यानी त्रत कथाएं: पृष्ठ ४४३--विज्येष विवरण के लिए देखिए;:-- राजस्थानी ब्रत-कवाएं : सम्पादक--- मोहनलाल पुरोहित 1




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