लंका तापूकी सैर | Lanka Taapuki Sair
श्रेणी : इतिहास / History

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
4 MB
कुल पष्ठ :
73
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)लष्का टापृकौ सैर । १५
0 সীল
कष्टौ बाटिकामें बनो खतच्छ नहर ।
कहीं प्राक्षतिक कोतिको कह रहो हैं,
छ्टाधोश वारोशकोत्रंक शद्रे ॥ ६॥
कष्टं पेडको पत्तियां हिन रहो हैं,
कहीं भ्रूमिपर घासद्डो का रहो सै।
सुगन्धें कहीं वायमें मिल रहो हैं,
कहों सारिका प्रमसे गा रहो है ॥ ७ ॥
कच्चों पवतोंको छटा है निरालो,
जहां वक्तके द्व द छायगे घने हैं।
लगी एकसे एक प्रत्येक डालो,
मनों पान्यके हेतु तम्बू तने हैं ॥ ८ ॥
कहों दोड़ते क्ाड़ियों बीच इरन,
लिये मोदसे शावकों को भगै हैं।
कष्टों भुधरों से करें रम्य भरने;
अच्छा ! दृश्य कसे श्रनृठे लगे हैं ॥ ८ 0
कीं खेतकीे खेत लह्टरा रहे हैं;
प्रसन्नात्मा हैं कृषोकार सारे ।
उन्हें देखकर मृंछ फइरा रहे हैं,
सदा घूमते कांधघ पर लट्ठ धारे॥ १० ॥
झनोखी कला सचिदानन्दको हः
खसोको स्भो वस्तुमें एक सत्ता ।
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