आर्यसमाज के एक सौ प्रश्नों का उत्तर | Aryasamaj Ke Eksoi Prashno Ke Uttar

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Aryasamaj Ke Eksoi Prashno Ke Uttar by अजितकुमार जैन शास्त्री - Ajeetkumar Jain Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ७ ) परम्परा वां पर दी समाप्त दो जाती है, इसी प्रकार आत्मा के साथ सन्तानङूप अनादिक्राल से लगे हुए कर्म भी समाप्त हो जाते हैं । जिन बुरे भावों से कर्म बँधते हैं उन भावों को आत्मा यदि दृटा दे तो फिर आगे कर्मबन्ध भी नहीं हो पाता । गन्धकी कुंड में ( जिन चूते हुए पानी के कुंड के नीचे गन्धक आदि पद्‌/र्थ होतां है ली कारण कारण-अनादि से उन कुंडो का पानी गर्म होता दै ) पानी अनादिकरात्न से गर्म ' दांता है, किन्तु यदि उली जलको वहां से निकाल कर गह्ढा आदि नदी में डाल्न दिया जावे तों उसकी बेखी अतादि का- लीन गमे दालन खत्म हो जाती है। दसी प्रकार अनादिकालीन कमे भी आत्मा से अलग दो जाते है. । कमे श्रात्माके साथ संयोग सम्बन्ध से रहते है; इखो कारण वे च्ूटते भी रहते हैँ । नियमाचुसखार किसी समय वे बिलकुल सी आत्मा से दुर दो सक्ते है । अत्मा की वैभाविकदशामे क्मौ का बन्धन होना र्ता है । जिस समय वह विभावदशा मिरकर स्वाभाविकद्शा प्रगट दोजाती है, कमंबन्च्र भी बन्द दो जाता है । जैसे कि श्रि आंदि की उपाधिसे पानो गर्म होता है ओर ज्व वह उपाधि ঘতত আন রী पानी अपनी असल द्वाल्त में आकर ठंडा दो जाता है। प्रश्त ३--पर्याय बदलता द्रव्य का स्वासाविक धर्म है या वैसाधिक । यदि स्वाभाविक है तो मुक्त जीवों का पर्याय




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