आचार्य रामचंद्र शुक्ल | Aacharya Ramchandra Shukl

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
13 MB
कुल पष्ठ :
298
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)उपक्रमस्मृति के प्रति मेरी कितनी उत्लाठा रही होगी, यहां अनुमान करने की बात 1
कहने की आवश्यकता नहीं कि यह सजीव स्थृति' ग्रेमघन जी ही थे । अपनी ६
मित्र-मंडली के साथ ये ग्रेमबन” की पहली ककः मीने आए थे। इस प्रकारदेखते हैं कि शुक्ल जी का बाल्य-काल साहित्यिक विभृतियों के श्रवण, स्मरण :+ 4৯.
दशन से प्रभावित ह्र ।किशोरावस्था में प॑० केदारनाथ पाठक से परिचय होना भी शुबल जी के साहित्यिक২৯৮০ ০১৬ ৭১৬ বানর [व भ ২,
जीवन में विशेष महत्त्व रखता है। इनके सोहित्यिक जीवन को अग्रसर और प्रोढ़
करने में अवश्य ही उन्होंने सहारे का काम किया । इन्द नागरीप्रचारिणी सम मेँलागे में भी उन्हीं का प्रधान हाथ था । पं» केद्रनाथ पाठक ने मिजापुर में ॥मेमोरियल लाइज्रेरी' खोली थी । शुक्ल जी को यहाँ से अँगरेजी और हिंदी টিনা
भाषाओं की पुस्तकें पढ़ने को मिलती थीं | शुकक्ष जी के लिए हिंदी-पुस्तक एकन्र ;में पाठक जी की विशेष प्रबंध करना पड़ता था, क्योंकि वै चाहते थे कि ये हिंद
पुस्तकी का अवलोकन करें । हिंदी की ओर शुक्ल जी की यब्त्ति तो थीं ही ।प्रकार प॑> केदारनाथ पाठक शुक्ल जी में अभ्ययन फी प्रदृति जगाने ओर ৃ गीन-
बृद्धि करने में सहायक हुए । शुवल जी में अध्ययन का व्यसन आरंभ से ही था গং
यह अंत तक बना रहा । पिछले काल इन्हें प्वास और खाँसी का रोग हो गया भा ।रोग की अवस्था में भी यह व्यसन नहीं छूट पाता था । देखा गया है कि ये ॥
जाते थे और पढ़ते जाते थे ।लगमग पंद्रह-सोलह वर्ष की अवस्था में शुक्ल जी को ऐसी साहित्यिक £
भंडली मिल गई जिसमें निरंतर साहित्य-चर्चा हुआ करती थी। अब हमारे शुबयौ.सी
हसंसतेसमुजीआपमें को हिंदी का एक लेखक समझने लगे। 'प्रेमघम की लाया-ष्परतिः नामकलेख में आपने एक स्थान पर लिखा है---““१६ वर्ष की अवस्था तक १तौ समवरयस्क दिंदी-ममियों की एक खापरी मंडली शुभे मिल ग । जिनये १
काशीप्रसाद जी जायसवाल, बा० भगव्रामदास जी दालना, 'पंर बद्रीनाथ गौड़,हू
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পৃअगला करपे ग॒ुद्य मे ! हिंदी के नए-पुराने लेखकों की चर्चा, बरावर इस भैडली'त
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प्रमें रहा करती थी । म भी श्रव श्रप्तै कौ एक लेखक सानन्ने लगा था। हम सीमेकी बातचीत प्रायः लिखने-पढ़ने की हिंदी में हुआ करती थी, जिसमें “विस्सदिह!
इत्यादि शब्द आया करते थे ।” अब इनकी सूरत” पर. हिंदी का. शौक! पालक
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