शास्त्रवार्तासमूच्चय | The Sastravartasamuccaya Of Acarya Haribhadrasuri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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५१हम देखते हं कि इस खंडन ने अथ के चये स्तवक की समी. १३७ काकिर्थोको . तथा छठे स्तवक की ६३ कारिकाओमें से ५३ को घेर रखा है (अर्थात्‌ ७०० कारिकार्ओ वाले इस ग्रेथ की १९० कारिकाओं का सीधा संबंध प्रस्तुत खेडन से_है)। इस ग्रेथ-भाग का सही मूल्यांकन कर सकने के लिए आवश्यक होगा कि भारतीय दर्शन के इतिहास से संबंधित दो-एक वातें ध्यानमें रख ली जाएं |प्राचीन भारत के दार्शनिक साहित्य में तार्किकता की वृद्धि क्रमशः हुईं. . थी, ओर इस वृद्धि में सब से महत्त्वपण योगदान दिया है कतिपय उन सम्प्रदायों ने _ जिन्हें पर्याप्त. हढता के साथ यह विश्वास था कि विश्व के घटना-ऋछाप के बीच,. वतमान कायकारणसंवंध वास्तविक है तथा अनुमानगम्य है| इन सम्प्रदायो को. पहचानने की कसोटी है उनके कतिपय अनुयाग्रियों द्वारा रचित वह समृद्ध साहित्य जिसमे हम एक ओर अनुमान ( तथा दूसरे ज्ञान-साधनों ) के स्वरूप आदि.से संबंधित गंमीर चर्चाएं पाते हैं तथा दूसरी ओर कार्यकारणसंबंध के स्वरूप आदि से संबंधित गंमीर चर्चाएं---अर्थात्‌ं जिसमें हम एक ओर प्रमाणशा्र संबंधी गेभीर चर्चाएं पाते हैं तथा दूसरी ओर सत्ताशाख संबंधी गंभीर चर्चाएँ | प्रस्तुत कोटि के साहित्य के प्रणेता दाशनिक्र ही तार्किक” विशेषण के सच्चे अधिकारी दै जर. इस विशेषण का प्रयोग हम उन्हीं के संबंध में करेंगे | मोटे तोर पर यह साहित्य निम्नलिखित चार उप-विभागों में विभक्त है।(१) न्याय-वैशेषिक तार्किक्रों द्वारा रचित, (२) मीमांसक ताकिकों द्वारा रचित, (३) वेद्ध तार्किको द्वारा रचित,(४) जेन तार्किको द्वारा रचित ।[ स्वये शाखवार्तासमुच्चय इन चार उप-विभागों में से चोथे के भन्तगीत: आती है--क्योंकि हम देख चुके हैं कि ग्रेथ के अधिकांश भाग में--. प्रायः पूरे अथ में--कतिपय सत्ताशाख्रीय সহনাঁ লী, चर्चा की गई है ओर. अब हम यह भी जान लें कि इस ग्रंथ की रचना-शैली .ताकिकतापूर्ण . है।] विभिन्‍न सम्परदा्यों के अनुयायी तार्किकों द्वारा रचित अस्तुत .कोटि के.. साहिलयमें एक-दूसरे की मान्यताओं का खेंडन खुलकर हुआ है ओर यही कारण




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