लोकतंत्र | Loktantra

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Loktantra by डेविड बीथम - Devida Bithamदेसराज गोयल - Desaraj Goyal

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डेविड बीथम - Devida Bitham

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देसराज गोयल - Desaraj Goyal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भूमिका नागरिक समाज के व्यवस्थित सचालन के लिए लोकतंत्र के उपयाग का इतिहास लंबा और ऊचनीच से भरा हुआ है। अपने देश भारत के प्राचीन गणतत्रो अथवा यूरोप के एथेन्सी लोकतंत्र का इतिहास ही हमें दो हजार वर्ष पीछे ले जाता है और हम देखते हैं कि उस काल के मानव समाज में भी लोकतंत्रीय संस्थाएं किसी-न-किसी रूप मे विद्यमान थीं । मानवीय गतिविधि जैसे जैसे व्यापक रूप लेती गई मानव दृष्टि में भी व्यापकता आती गई। नागरिक समाज निर्माण करने की आकांक्षा ने मनुष्य को लोकतंत्र की ओर अग्रसर होने के लिए प्रेरित किया क्योंकि यही ऐसी व्यवस्था है जिसमे सर्वसाधारण को अधिकतम भागीदारी का अवसर मिलता है। इससे केवल निर्णय करने की प्रक्रिया ही में नहीं अपितु कार्यकारी क्षेत्र मे भी भागीदारी उपलब्ध होती है। अपने विकास-क्रम के विभिन्‍न चरणों में लोकतंत्र ने भिन्‍न भिन्न परिस्थितियों को अन्यान्य मात्रा में सुनिश्चित करने का प्रयास किया है। हमारे देश मे स्वतन्रता संग्राम से लोकतंत्र को बेहद प्रोत्साहन मिला। कारण कि इस सग्राम का आधार मुख्यतया विशाल सामान्य जन की सक्रिय भागीदारी थी। यह हथियारों से किसी छोटे से गुट तक सीमित नहीं था। विदेशी साम्राज्य से मुक्ति पाने के लिए संग्राम की इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से हमें लोकतंत्रीय गणतत्र स्थापित करने की प्रेरणा मिली । परिणामतया गणतत्र के उद्घाटन के साथ ही साध व्यस्क मताधिकार और प्रतिनिधि शासन का भी प्रादुर्भाव हुआ। यह एक ऐसी उपलब्धि है जिसकी प्राप्ति के लिए अन्य देशों को जो अपेक्षाकृत अधिक विकसित हैं शताब्दियां लग गई। हमने लोकतत्र का जो प्रयोग किया है उससे कई प्रकार की सीख मिल सकती हैं। पहली तो यह कि क्या केवल मताधिकार से वैसा बहुमत का शासन स्थापित हो जाता है जिसका आश्वासन लोकतंत्र से अपेक्षित है ? हमारे संविधान में जिस चुनाव-विधि का प्रावधान है उसके अनुसार किसी चुनावभ्षेत्र में सबसे अधिक मत प्राप्त करने वाले को विजयी घोषित कर दिया जाता है। इसका यह भूमिका प्रकाशक द्वारा पुस्तक के भारतीय स्करण में जोड़ी गई है।




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