सागर सरिता और अकाल | Sagar Sarita Aur Akal

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Book Image : सागर सरिता और अकाल  - Sagar Sarita Aur Akal
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सागर-सरिता ओर अकाल४बह समझे कि अनिल को भी उन्होंने प्रभावित किया है । वह किसी मंत्र कोबारम्बार रटकर स्मरण कर लेने की चेष्टा कर रहा है । उनका अनुसरण |वह अब भी साधारण जन से उच्च है। एक गये उनमें उदय हो गया । वह अपने से मुग्ध खढ़ा अनिल कौ ओर देखते रहे । .उन्होंने अपनी दृष्टि उसके हाथों से परों की ओर धीरे-धीरे सरकाई । उनके संसंसे भोगवादी अनिल में जो यह परिवत्तंव हो रह्या है उससे उसके शरीर पर क्या.प्रभाव पढ़ा है यह वह आँकना चाहते थे । ५भट्टाचाय की दृष्टि अनिल के वक्ष तक पहुँची और उनपर रखी एक चौकोरवस्तु पर अटक गईं। चौखटे में जड़ा चित्र जो दर्पण भी द्वो सकता है ।इदु ने कल्पना की योगिराज श्रीक्षष्ण, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, अथवा स्वामी विवेकानंद । मन ने पूछा--बोलो कौनइदु ने अपने जुआ खेला | श्रीकृष्ण, नहीं विवेकानंद । तीन चार बार तीनों.पर बारी-बारी से बल देने के परचात्‌ निश्चय किया श्रीकृष्ण ।लपक कर उन्होंने अनिल के ऊपर से चित्र उठा लिया। उलट कंर देखावह चौखटा उसके हाथ में आकर जेसे ,प्रज्ज्वलित हो उठा । ताप भद्टाचार्य के लिए भसह्य हो गया | वह छूट कर नीचे गहे प्रर गिर पड़ा ।भट्टाचाये महाशय का योग-साधन नारी-दशन खण्डित होते-होते बचा ।मन में उठा--केसा नीच है यह अनिल | किस निलज्जता से इस गन्द चित्र कोहदय से चिपटये था ।अनिल ने फ़ोटो गिरने का शब्द सुनने के परचात्‌ भट्टाचाये के द्वाथ को अपनीछाती की ओर बढते देखा । वह इड़बढ़ा कर उठ बेठा । सुहासिनी के पत्र-खण्ड _शीघ्रता से कमीज को जेब में डाले और चित्र को उठाकर पीठ पोछे छुपा लिया । जब उसने भट्टाचाय के नयनों में देखा तो पाया वे नयन लैसे उसे घोर अपराधीसमभ रह ह । उनके लिए जैसे उसने इत्या जैसा को$ जघन्य पाप किया दो । अनिल बोला नहीं । चुपचाप अपने ट्रक की ओर गया और चित्र नीचे रखकर.१४




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