बुन्देलखण्ड में पंचायत राज संस्थाओं का क्रियान्वयन : एक आलोचनात्मक मूल्यांकन | Bundelkhand Me Panchayat Raj Sansthaon Ka Kriyanvayan Ek Aalochnatmak Mulyankan
श्रेणी : राजनीति / Politics

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
56 MB
कुल पष्ठ :
303
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)इतना ही नहीं 'पंचायतों' के गठन का एक अन्य सूत्र लान है “स्थानीय
समस्यायें, स्थानीय, स्थानीय संसाधन, स्थानीय लोग और स्थानीय समाधान |” यह एक ध्रुव सत्य
है कि किसी क्षेत्र विशेष की समस्याओं से जितना अधिक साक्षात्कार स्थानीय स्तर के लोगों का
होता है उतना शीर्ष प्रशासन सेकदापि नहीं। अपनी क्षमता व अपने संसाधनों का भी उन्हें ही
सम्यक ज्ञान होता है। ऐसे में यदि उन्हं अपने स्तर पर “निर्णय शक्ति” अर्थात शासन .का
अधिकार दे दिया जाये तो संभवत: वे अपनी समस्याओं का अधिक अच्छा और स्थायी समाधाननिकाल सकने में सक्षम होगें। इसके अतिरिक्त “स्थानीय शासन” का अधिकार मिलने से लोगअपनी मूलभूत आवश्यकताओं और मौलिक के वाहक बन सकेगें |
यहीं कारण है कि नये स्वतंत्र भारत के शासन की रूप रेखा का निर्धारण कर
रहे संविधान समा के नीति नियामकों ने प्राचीन भारत के ग्रामीण प्रशासन की धुरी ग्राम
पंचायतों को पुनर्जीवित करने का प्रयत्न किया। यद्यपि डा0 अम्बेडकर द्वारा प्रस्तुत प्रारूप
. संविधान में पंचायतों के विषय में एक भी शब्द नहीं कहा गया था और न ही प्रारूप समिति में
किसी भी स्तर पर इस विषय पर कोई बहस की गई, फिर भी राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के
अनुच्छेद 40 में “पंचायत” को स्थान मिला जिसमें कहा गया कि “राज्य ग्राम पंचायतों का
संगठन करने के लिये कदम उठायेगां ओर उन्हे एसी शक्तियाँ ओर अधिकार प्रदान प्रदान
करेगा. जो उन्हं स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने के योग्य बनाने के लिये `
आवश्यक हँ (* इसी के साथ सातवी अनूसूची की द्वितीय सूची अर्थात् राज्य सूची की प्रविष्टि 5 `
. में ग्राम पंचायतों को शामिल किया गया। इस प्रकार पंचायतों को संवैधानिक महत्व तो मिल
.- गया किन्तु संवैधानिक दर्जा नहीं प्रदान किया गया। क्
स्वतंत्रता के पश्चात पंचायतों को गठित करने व उन्हें कारगर बनाने के लिये
बहुतेरे उपाय किये খা विभिन्न राज्यों में विभिन्न सरकारें बनी। उन्होने पंचायतें स्थापितथा णभ ও এ मो भ्म सिम यम म कोम [म त বি পা রা ও কালা গার গার পা ৪৫ এরা কারার,1 एन0 राजगोपाल राद “पंचायती राज” ए स्टडी आफ रुरल लोकल गवनमिन्ट इन इन्डिया
नई दिल्ली (1992) प्र0 ३५
2. ङ छ ए अवस्थी “भारतीय राज व्यवस्था” आयरा ग्र0 190 द ২...
371 स्वतत्रव के प्रश्चात पंचायत संरचना के पुनर्गठन एवं सुधार हेतु जो भी उपाय किये ययेउनका विस्तृत उल्लेख प्रस्त शोध प्रबन्ध के दूसरे अध्याय “श्रत मै ग्रामीण प्रशासन” के.
अन्तर्गत किया হা 8 /
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