कवि विद्यापति | Kavi Vidhyapati

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Kavi Vidhyapati by गंगाधर मिश्र -Gangadhar Mishra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सामान्य-परिचय ঙ देख देख राधा रूप अपार, अपरुब के बिहे आन मिलाओलछ , खितितल लावनि-सार । अंगहि अंग अनंग मुरछायत, हेरये पड़ये अथीर। मनमथ कोटि मथन कर्‌ जे जन, से हेरि महि-मधि गीर । कत्‌ कत छखिमी चरन-तर नेओशये, रगिनि हेरि बिमोरि। कृरु अयिखाष मनहि पद-पकज, अहोनिसि कोर अगोरि। राधा की सौन्द्ये-विभूति की यह महिमा है, जिसने अपनी अपूर्वता से बह्मा को अपूर्वं बना दिया है} जिसकी प्रभविष्णुता से सुग्ध होकर करोड कामदेवो का मानमर्दन करनेवाले श्रीकृष्ण पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं। जिस सौन्दर्य- शालिनी को देखते ही मुग्ध हो कितनी लक्ष्मियोँ को न्‍्योछावर किया जा सकता हे । विद्यापति की यह अभिलाषा है किं उनके चरण-कमर को दिनि-रत गोद में यत्न-पूर्वंक आदरणीय बनाये रखे । जिस प्रकार राधा के सौदर्य की अचूक प्रभविष्णुता से कृष्ण अनुप्राणित हें, उसी प्रकार कृष्ण के रूप-बेभव पर राधा भी मसुग्ध हैं :-- की रागि कौतुक देखलो सखि निमिष लोचन आध मोर मन-मृग मरम बेधल विषम वान वेध | श्रीकृष्ण की अनुपम सौदर्य-श्री का अदूभुत-चमत्कार ह ¡ जिसका क्षण भर के लिये आधी लौ से साक्षात्कार होते ही प्रेम के तीत्र आकर्षण ने व्याघ के ऋर प्रहार की भॉति राधा के मुग रूप मन को मर्म-स्थल की चोट पहुँचा दी । आत्म-सपपंण की इस मुग्धतावद्धिनी स्थिति का परिचय वह सखी को इस प्रकार दे रही हैं :--- ए सखि पेखलि एक अपरूप, सुनइत मानवि सपन-सरूप । कम जुगछ पर चाँद क माला, तापर उपजल तरुन तमाला।




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