मधु - चिकित्सा | Madhu-chikitsa

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Madhu-chikitsa by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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मघु-चिकित्सा 1 चाहिए । एक यार सुवह पी लेनेके उपरान्त फिर दिनमें और भी तीन चार वार इसी तरह गरम पानीमें मिठाझफर पीना चाहिए । परन्तु भोजनके उपरान्त नहीं पीना चाहिए, घल्कि सदा भोजन करनेसे घटे व्गथ घटे पहले पीना चाहिए । इन बाततका अवथ्य ध्यान रखना चाहिए फि गहड मिला हुआ जठ उतना ही गरम हो जितना गरम साधारणतः डारीरमेका रक्त होता है । यदि पानीसी गरमी गरमीसे सध्कि होगी तो उससे टामकी अपेन्ञा हानि ही अधिक होगी | यदि पानी जछ अधिन गरम हो तो उने थोडी ढेर तक यों दी रखकर ठढा कर लेना चाहिए । चहूनसे लोग प्राय भोजनके साथ चाय या कहता पीचा करते है । यदि वे इन स्थानपर गरम पानीमे डाहदद मिला कर पीया करें, तो थोडे ही समयमें उन्हें आश्चर्यननक लाभ प्रतीत होने उगेगा। आय मादि रोगोंमिं किनी प्रकारके खाद्य पदार्थम प्रति रुचि नहीं रहू जाती | यदि ऐसी अवस्थामें टूडादी सहायतासे अथवा इसी ग्रद्धारणी और रझिसी क्रियासे पेटर्मेका मछ निकालकर कोप्रशुद्धि कर ढी जाय और तत्र टमी प्रकार गरम जमें डाहद मिढाकर घंटे घठे भर पर पीया जाय तो भी बहत अधिक लाभ देखनेमें आता है। 'इससे भोजनरसी ओर रुचि बदती हैं, भूख लगती है, डरीरके वढठका नाग नहीं होने पाता और थारीर वीघ्र ही नीरोग हो जाता हैं । ऐसे अयसरोपर गददके आरोग्यवर्वद्ध गुर्णाका बहुत और अच्छा पता चड जाता है | /मर्जीण अथवा इसी प्रकारके और अनेक रोगोंकि कारण भोजन परे रचि विछ्कुल हट जाती हैं और उन्हें कुछ भी भूख नहीं लगती | यदि ऐसे लोग इूगके द्वारा अथवा और किसी प्रकार पहले अपना पेट साफ कर ढ ऑर तत्र दो चार उपवास करके इसी प्रकार




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