जैन सिद्धान्त भास्कर | Jain Siddhant Bhaskar
श्रेणी : धार्मिक / Religious

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
12 MB
कुल पष्ठ :
400
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
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खीकधेसाष् था जैसा कि दिगम्बराप्ताय के शास्वा मं बताया गया दे। यदि इसक
विपरीत निनप्रतिमा का स्वल्प घस शर श्रासप्णामे श्रित माना जायते षहा
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प्रणमामि विशुद्धये जिनाना प्रतिश्याण्यभिन्पमूतिमन्ति 1ध्रात्-- जमं मर्गा का भत कर देन पाठे निना फो मूतिया जञा बिल्कुल उाह्दों फी
जैसो योन है अपनी इत्र शाति फे दा यद बतलाती है पि फयायपुक्ति पैते प्रा्तफौ
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फिये, उन मूतियो पर वादि श्द्वार कैसे सभारित ष्टौ सकता दै । श्रत यह माना
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भ्णातप्रसक्नमप्यस्यासाप्रस्थापिकार्टरक् ।
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अपावु--“ज्े शात, प्रसस, मध्यध्य, नासप्रस्थित भयिकारा दृप्याएा द्वा।, निम्तका
গম লানযামত্ষন सहित हो, अउुप्म बण हो, भोर शुमरत्तणा सद्दित द्दों सोद्र भादि
भारद दोपा से रहित हो, प्रशोर यृत्तादि प्रातिदायों से युक्त दे भर दोना तरफ यक्त यत्ती
से बेण्लि हो, ऐसा जिपतिमा फो यनपरर दिबि सदित सिंदासन पर दिखनमान
ए! यद् दिए प्रतिमा का अदर्श रूप ऐ। ऊिन्तु बहुत सी एसी प्रतिमाय मिलती है
जिनम प्रातिहार्य মাহি হজ भी नहों होत। इससे प्रर्द है कि व्ययद्वार में सुतिघा-
घुसार লিল্দী লি प्रतिमा फो मनात, जिस्म वातरागरधि, सौम्य भारति भोरगचस्ना होना निचाय्य द! |
अर प्रश्न यह है कि ये प्रतिमा: झिस वस्तु को ओर फिन किन महापुरषा यो मनाईज्ञाता ? तथा उक बनाने फः स्यान पया क्या दे १ इन प्रश्ना के उत्तर म दम “घमुनन्दि
भायद्रागरादि” के निन्न श्छोक मिलत ইৎ ০$ प्रीशसरादार (হন) হত ও २ षमुनन्दि শাহামায় (ব্যান) ছু ছল
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