दशलक्षण धर्म | Dashlakshan Dharm

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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११भरर विपुलचिचैरुतमा सा क्षमादो रिषपथ रि सत्सदहायत्वमेति ॥ ८२॥ ( पदह्मनन्दि पृष्ट-४२ )मूलं--भज्ञानीजनों के द्वारा वध, बन्धन, कोध, हास्य भादि किये जायें, तथापि साधु भ्रपने निमंल भ्ौर गम्भीर चित्त से विकृत नहीं होते, वही उत्तमक्षभा है; रेषौ उत्तमक्षमा मोक्षमागं के पथिक सन्तो को यथायंतया सहायता करने वाली है ।उत्तमक्षमा किसके होती है !उत्तमक्ष मादि जो दश धर्म हैं उतउमे सुख्यतया तो चारित्र काटी प्राराधनदहै, भ्र्थातु उन दस्त धर्मों का पालन मुख्यतः सुनि- दह्षा में ही होता है, श्रावक के गोणरूप से प्रपनी-प्रपनी भूमिका के प्रनुतार अ्रंगत: होता है । मोक्षमा्ग ही दशंत-ज्ञान-चारित्र की एकतारूप है, वह चारित्र दशा में ही होता है; सम्यग्हष्टि जीवों के नियम से चारित्र प्रगट होना ही है, इससे चौथे.पाँचवें गुणस्थान में भी उपचार से मोक्षमागं कहा है। उत्तमक्षमा भ्रर्थात्‌ सम्यकदर्शनसहित क्षमा | उत्त मक्षमा मिथ्यादृष्टि के नहीं होती ।उत्तमपमा के अतिरिक्त अन्य चार क्षमाएंक्षमा के पाँच प्रकार हैं, उनमें से चार तो पुण्यबन्ध के कारणरूप हैं भोर पाँचवें क्षमा को 'उत्तमक्षमा' कहा जाता है, वह धर्म है ।(१) 'यदि में क्रोध करू गा तो मुझे हानि होगी, यदि में इस समय सहन नहीं करूगा तो भविष्य में मुझे प्रधिक हानि होगी - ऐसे भाव से क्षमा करे तो वह रागरूप क्षमा है। जिसप्रकार निबंल मनुष्य बलवान का विरोध नहीं करता वेत्ते ही-'यदि में क्षमा करू तो मुझे कोई हैरान नहीं करेगा-ऐसे भाव से क्षमा रखना सो बन्ध




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