प्रयोगधर्मी नाटककार जगदीशचन्द्र माथुर | Prayogdharmi Natakkar Jagdish Chandra Mathur

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Prayogdharmi Natakkar Jagdish Chandra Mathur by मीनाक्षी काला - Minakshi Kala

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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है। नाटक सम्पूर्ण जीदन वी व्याव्या नही, वरनू जीवन वो एव प्रभावोत्यादक परिस्थिति, घटना या হত সনম वा चित्र है। इसमे प्रासगिव कथाओं वे মিতু स्थान नही होना वयोवि' इसमे सक्षिप्तता पर विशेष बल दिया जाता है। इंसी- लिए नाटक बा रचनाविधान समय-सीमित होता है और दोन्ौत घटो में ही कितना कुठ प्रदिव करने यौ अनिवार्यता प्रयोगाधित्य बी भाग वरती है । तीसरा बारण यह है. विः उसवा वया-सयोजन भिन्न प्रवार वा होता है भौर विभिन्‍न सूत्रो में अन्विति प्रयोग के विना नहीं लाई जा सवती । साटब যান नव सरल वर मभिनयशील होता है ! उसमे आवद एव रोचय प्रगे पा होता आवश्यव है। कथानव मे सदेव सुसम्बदता होती है जिससे पाठप' की जिशासा निरन्तर बनी रहती है। इसी प्रवार पाश्रन्यसिल्पना वे आधार पर भी नादयविधा प्रयोगधर्मी है व्योवि साहित्य में नाटब' और नाटक में पात्र-सुष्दि वा विशेष महत्व है। वसा साहित्य मे तो मथा विस्तार, वर्णन-सौप्ठव और विवेचन विश्लेषण से भी काम चलाया जा सकता है प्रस्तु नाटपय वा तो पृणणे काये-ब्यापार ही पात्र और उनवे' अभिनय बे' माध्यम से सपन्‍न होता है । अत जगदीशचन्द्र माधुर ने पात्नों ने' माध्यम से प्रयोग बरवे नाटक को मच पर दृश्य रूप में प्रस्तुत किया है। उनसे पूवं नाटक का म्न उसकी एव अतिरिवित विशेषता थी ओर अब उते नाटके कौ एकः भनिवायं पते माना गया है। माट्यात्रेस मे प्रस्तुत पात नादबकार द्वारा रूपायित केवले एषे रेखाचित्र है जिसे मच पर अभिनेता और निर्देशक को अपनी भुम एव प्रतिभा से रग कर एक जीवन्त चपिय वे रूप मे प्रस्तुत वरना है | सवादो और भाषा के' विदुआ वो भी लेकर हम वह सवते हैं वि नाट्यविधा प्रयोगधर्मी है, क्योंकि मपूर्ण वाड_मथ का सूजन शब्दो से होता है । परन्तु नाटव वी यह विशेषता है विः इसवी सृष्टि वा आधार उच्चरित शब्द है और शब्दा के उच्चारण वी माग को पूरा वर नाटक इनवा अधूरापन समाप्त घर देता है) नाटकबजार के लिए शद्ध साधना ही समस्त उपलब्धिया का मुल है । साने न भी ' वाद इज लिटरेचर मे * केवल शब्द वो ही व्यक्ति चरित्र के समस्त रहस्पो को उद्घाटित करने वाला अचूक साधन माना है और नादगवार इस साधन वा भरपूर प्रयोग बरता है ४” जबकि पटजे भी यही कहते हैं वि---/“नाटक मे प्रत्येक कथन ठीक उतना ही होता है जितना कि उसे होना चाहिए 1” (दि ज्ञाइफ बॉफ दि ड्रामा) ६ ए तिबोल बहूते हैँ वि-“नाटकबार को ऐसी नाटबीय भाषा का प्रपोष वरना होता है जो दोहरा प्रभाव उत्पन्न करे! एक भोर उसम नोटकबार वे अपने व्यक्तित्व और निजत्व की छाप हनी चाहिए और दूसरी ओर उन सवादो मे वक्ता वे व्यक्तित्व के लिए उपयुक्त हो 1 (वर्ड ड्रामा)। इस प्रवार नाटककार दोहरी प्रक्रिया की कठिन परीक्षा से गुजरवर प्रयोगधर्मी बनता है । निष्वर्षत प्रयोगधर्मी नादककार : जगदोदाच् सायुर १५




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