गन्धमादन | Gandhmadhan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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উদ प चुपचाप पडे रहने के लिए बाध्य हो। मेघ में दोनो गुण हैं, पर हमारे मुंशी जी को दूसरा गुण ही रुचिकर लगा । अत- ऐसे उदाहरण के रहते इए मो मैं कैसे मान छूँ कि नाम में क्या रखा हैं ? अरे, मुझे तो अफसोस है कि माता-पिता ने मुझे कुबेर के नाथ की नकेऊछ क्यो पहनायी, और 'कुबेरनाथ' कर के एक महा अडबंगी, दरिद्र और सनातन हिप्पी देवता का नाम दे डाला, जो अपने चढने के लिए एक घोडा तके नही जुट पाया, हाथो भौर विमान को तो बात ही क्‍या ? हो सकता है कि यदि मेरा नाम सात्र कुबेर रहता तो यक्षराज घनद के रथ का पहिया मेरे आंगन में ही टूटता मौर उस पर लदे होरे-मोती, रुपये-पैसे के बोरे मेरे आँगन में हो सडते । पर अब तो गरती हो ही गयो। अब क्या किया जाये ? अब तो इस जन्म को, इस जीवन को, नाम के अनुरूप रूप में हो उपलब्ध करना है, अन्यथा यह वेचारा नाम निरर्थक हो जायेगा भौर जन्म भर रोता रह जायेगा। इतने दिन से जो नाम जन्म-सहचर को तरह साथ-साथ छाया की तरह मेरो काया का सहवासी रहा, उस के प्रति मेरा ,मोहबद्ध हो जाना स्वाभाविक ही है। इसी से ठोस, झकाझक ठन्ननाते अर्थ! की चिन्ता न कर दाब्दो के अर्थ की चिन्ता किया करता हूँ । शब्दों के अर्थ तो भाव और विचार बन कर सदैव सामने प्रस्तुत रहते है । यहो क्या कम हैं? मात्रा कि भावों और विचारो से पेट नही भरता, पेट भरने के लिए ठन्ठनिया चाँदी का “अर्थः ही चादिए 1 परन्तु इन भावो गौर विचारों के बीच मन अपूर्वं अवगाहन, पूवं स्नान पा जाता है । यह अपूर्वं सुख हँ । जव तक सम्भव है, यह अपूव स्नान करता ही चलूगा, भले हो खाने को वस, वम-वम महादेव ही रहं । वमनवमन्महादेव ” यानी शून्य, हाथ की पकड में या मुट्ठी में आने वाली चीज नहौ । यह मेरे अपने नाम का ही एक अत्यन्त मस्तमौला सस्करण ह, एक भद्धूत फक्कड रूपान्तर है । वम-जम-महादेव, खाली, शून्य, पर अपूर्वं शक्तिमय महोच्चार !। लगता हं दुनिया कौ दिगन्त- शब्द-श्षी १५




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