जयंत | Jayant

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Book Image : जयंत  - Jayant
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्य |] पहला शङ्क ११1 | শি न क ५५ 1 क, এস জে চি জমি ^ | পানি লী পর লা , 20 পাটি +)कल्याणी-( पीठ पर द्वाथ फेरठी है । ) भाग्यवती बेटी !गोरी--सब तुम्हारी कृपा का फल है कल्याणी माँ ! तुस न पढ़ने के लिये सहायता देती, तो मेरे ग्ररीव मा-बाप बेचारें क्या कर सकते थे ? ( कुछ झहरकर ) आधचार्याजी तुम को बहुत याद किया करती हैं। तुम्दारी प्रशंसा सुना-सुनाकर हम सबको उन्नति की ओर दोड़ाया करती हैं।कल्याणी--( आँखों में प्रेमाअ भरकर ) आचायाजी का दशन कयि द घषं होगये । उनकी उत्तम शिक्षा का लाभ मेँ गृहस्थी मे प्रति त्षण उठाती हूँ बेटी; ग्रहस्थी के धोर अंधकारमय जीवन-पथ में जहाँ कहीं জুদ सतिश्रम द्वोता है, वहाँ आचार्यांजी दीपक लिये हुये मुझे मांग दिखाती हुई खड़ी- सी मिलती हैँ गौरी; उनके तो स्मरण-मातन्र से हृदय पवित्र ओर बलवान द्वोता है ।( यह कइले-कददत कश्याणी का चेहरा गंभीर और दृष्टि स्थिर शो काती है । )गोरी--अशोक भइया का क्‍या हाल है ९ कल्याणशी माँ !कल्याणी--अशोक इस षषं विद्यालय की उच्च श्रेणी भे गया है। गत वध उसे भी बेटी, तुम्हारी तरह अच्छे नम्बर मिले थे ।(गौरी की আবী दष से डवडक्रा शातोद और वह कल्याण के मुँड पर टकटकी लगाकर देखती है ।)गौरी--कल्याणी माँ, यह तुम्हारे पुण्य का प्रताप है।




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