ये लोग | Ye Log

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Ye Log by मत्स्येन्द्र शुक्ल - Matsyendra Shukl

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१८ | ये लोगं कर मैंने काका से कहा, आराम कीजिए । तंकलीफ बढ़े, तो मुझे खबर कीजिएगा । “गाँव में गर्माहट है । चल कर देखे, लोग क्या सोच रहे हैं। इस बीच कल्प जबर सिहं के दरवाजे पर पहुँच गया था । दोनों बहुत नाराज थे | वे सात पीढ़ियों को गाली देकर मुझे नष्ट कर देने की घोषणा कर रहे थे ।““बाम्हन का लौंडा, चला है कम्युनिस्ट बनने । ससुरे को अभी पता नहीं है। मेरे रास्ते में जो पड़ा, वह हमेशा के लिए बर्बाद हो गया है । चार बाँस बजवाया नहीं कि दिमाग दुरुस्त हो जायगा। नादान आदमी ने राह चलते दुश्मनी मोल ले लिया है । गँवई राजनीति में जबर खुद को तीसमार समझता था । मुझ पर दबाव डालने के लिए उसने पिता जी को दरवाजे पर बुलाकर तमाम तरह को नयी-पुरानी और खरी-खोटी बातें घुनायीं । पिताजी सन्न रह गये, जैसे समाज का निहायत भद्दा रूप उन्हें पहली बार दिखा हो | आदत के अनुसार वे चुपचाप हर बात सुनते चले गये । 'नोलिए कुछ । चुपाई मारने से काम नहीं बनेगा ४” सरौते से सुपारी काटते हुए कलपू ने डपट के लहजे में कहा । “इस समय केवल सुनना जरूरी है। बाद में समझ-बूझ कर जवाब दूँगा । पिता जी ने सहज वेष्णवी स्वभाव के अनुसार उत्तर दिया । धुरोहित के परिवार का आचरण गंगाजल-सा पवित्र होना चाहिए ।! बत्तख को तरह गरदन उपर की ओर तानते हुए जबर ने कहा । अब आपका परिवार भ्रष्ट हो चुका ই | जगेसर, जिसे मैं लायक और होन- हार लड़का समझ रहा था, चमारों के घर भोजन करने लगा है । उसका उठवा-बैठना बस उन्हीं लोगों तक सीमित है। यह बर्दाश्त के बाहर हो चुका है । थही नहीं, कुछ और भी बातें हैं! आग में घी डालते हुए कल्पू ने धीमी आवाज में कहा । जगेसर का चरित्र भी ठीक नहीं है । जगन की औरत धनराजी से उसका अवध सम्बन्ध है । जब देखो, उसी के घर में चुसा रहता है। क्‍या जरूरत है, जगन के घर में जाने की ।




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