भगवती कथा [खण्ड 1] | Bhagwati Katha [Khand 1]

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Bhagwati Katha [Khand 1] by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१.9 (कि इस छाया मगवत्‌ चिषे, मागवर्वोकी कयाश्रो से, भगवन्नाम संफीर्सनक्ले श्रवार और भ्रसारसे सम्बन्ध है। “यदि इस विपयमें में सदा जागरूक घना रा, इस लदयफा सदा स्मरण बनाये रखा, तव तो पतन होने पर भी मैं उत्थान 'की ओर अप्रसर हो सक्रगा[। यदि इस क्दयसे च्युव होकर खाभ दानिक्के चक्‍्करमें फरेंस गया, तथ दो शुद्ध पतन है ही। अनेक व्यापारियोंके साथ हम सबकी भी गणना दो जायगी। . इख प्रथम खसरडफे प्रकाशनं जो-जो असुविधायें, जो-जो वित्र चापं -हुदै, उन सवका विस्तारसे वणन किया जाय, तो इससे भी बढ़ा एकः पोथा घन जायगा ¡ फिर यह्‌ भागवती कथा न रह कर “प्रकाशन दुः्ख रोवन कथा” हो ज्ञायगी, जिससे _ पाठका कोड सम्बन्ध नदीं। भोजनालयागों बर्षाके दिमोमे भीरी लफड़ियेंसे भोजन बनानेमें, नये रसोश्येको क्तिना कर दोत है, इसे “रसोइया महाराज” -ही जान सकते है गृहस्थामीके परियारवालॉको तो बने बनाये भोजनसे काम। /विप्पर भी ठोक न बना, तो दाल घुली न्दी, छाग में पानी अलग-अलग -दोखदा है, रोटी कच्ची है, चावल में किनली हैं -- ये सब उपालम्प भौ मेते ट! उनका कसना ठोक भी है। स्का दसी वादक नौकरी पाता है। नहीं काम कर सकते, «यो अपना रास्ता लो ज्ो। 'खरी मजूरी चोखा काम! फोई अह- सान तो हमारे ऊपर कर ही नहीं रहे हो। इसीलिये प्रकाशन की असुविधाओँकों यहाँ नहीं कहूँगा। यथपि में तो शसेर से, नियमकी रस्पघीमें कपकर वेधा ह, कदींजा भा नहीं .सकता। दोड़ धूप करनेवाले व्यवस्थापकजी, आादि-आदि हैं, पिर ॐी मानसिक संकल्प वो देना ही पड़ता दै। यह नहीं




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