काया पलट नाटक | Kaya Palat Natak

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Kaya Palat Natak by श्री आत्माराम जी - Sri Aatmaram Ji

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about आत्माराम जी महाराज - Aatmaram Ji Maharaj

Add Infomation AboutAatmaram Ji Maharaj

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
काया पलट | १५ উরি কি রিট म. नरक ररर ९ दक राद ऽसीति रक्ते है फिर श्रौर फिसी से राह तीं । फुछ भरने का संदेह नहीं कुछ जीने की परवाद नहीं ॥ कुछ जुल्म नहीं कुछ जोरनहों कुछ दाद नहीं फ़रवाद नहीं । कु तेद नहीं कुछ वंद नहीं कुछ जबर नहीं आजाद नहीं॥ शागिद्‌ नहीं उस्ताद नहीं वीरान नहीं आवबाद नहीं । द जितनी वाते दुनि फ सभ भूल गये कुछ याद नहीं ॥ जो आशिक हैं? ॥९॥ मंत्री--( राजा की ओर देखकर ) देखिये राजन्‌ केसा गधे की भांति मुँह फाइकर रंक रहा है । राजा--अजी कुछ नदी सरासर शं े धूल फेंक रहा है । विदृषक--मानों फोओं में हंस फंस रहा है । राजा--वावा, अगर ऐसे दी संतोषी हों तो दर २ मारे २ क्यों फिरते हो † साधु-श्रच्छा वावा ( यह्‌ कह कर मुस्कराते हुये चले जाना ) राजा--(मंत्री की ओर देख कर ) देखा आपका क्रोध । मंत्रीं--टलने दो ऐसे अकड़खां को महाराज । (इतने में शत्रि के नो बजे का घंटा बजा ) शजा--ओंहो | ( नो वज चुके चांदनी रात के कारण समय जान नहीं पढ़ा अब चलना चाहिये। ( यह सुन कर सब उठ कर चलते हुये )




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now