जैन सिद्धान्त भास्कर | Jain Siddhant Bhaskar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ভিলা नकारः[ ले०--श्रीयुत पं० महेनद्रकुमार शास्र, न्यायाचाये, काशी ]“म्ोत्तमार्गस्य नेतार मे्तारं कम॑भूथरताम्‌ | ज्ञातारं विभ्वतस्यानां बन्दे तदुगुणलब्धये ॥” ` -सवोैसिद्धियह श्रोक सवौर्थसिद्धि के मङ्गलश्ोक फे रूप में उपलब्ध दै । आचाये विद्यानन्द ने अपनी श्राप्परीक्ञा इसी शोक में वरत आप्रखल्प के परीक्तण के लिए बनाई है । त्रप्रपरीत्ता के अन्त में खयं निखते हैं--“श्रीमत्ततार्थशाल्हुतसलिलनिषेर्डिरलोदवस्य | प्रोत्थानारम्भकाले सकलमलभिदे शाख्त्रकारे: कृत॑ यत्‌ स्तोत्र तीर्थोपमान पृथितप्रथुपर्थ स्वामिमोमांसितं तत्‌ । विद्यानन्दे: स्वशक्तया कथमपि कथित सत्यवाक्याथसिद्ष्ये ॥” अथीत्‌-जो दीम रत्नों के उद्भव का खान है, उस अड्डूत समुद्र के समान तत्त्वाथशाल्र के प्रोत्थानारम्मकाल--उत्पत्ति का निमित्त बताते समय या प्रोत्थान-भूमिका बाँधने के प्रास्म्मकाल मे शाखक्रार ने जो स्तोत्र रचा और जिस स्तोत्र में वर्शित आम्र की स्वामी (समन्तपद्राचाये) ने मीमांसा की, उसकी मैं यथ्राशक्ति परीक्षा कर रहा हूं ।अध्टसहस्ी के मड्लशछोक में भी आचार्य विद्यानन्द यही बात लिखते ই “হাজালবাহ* रचितस्तुतिगोच।राप्रमीमासितं कृतिरलङक्रियते নযাডজ্ঞ”-_স্সগীনূ হাজ-_বক্লাপহাজ के श्मवतार-ऋअवतरणिका-भूमिका के समय रची गई स्तुति मे वणित গাম की मीमांसा करनेवाले आप्तमीमांसा नामक ग्रन्थ का व्याख्यान किया जाता है। यहाँ 'शाल्रावतार' शब्द গামथोट : 'औैन-बोधक' वर्ष ५८, संख्या ३, में आस्थानमहाविद्वान्‌ श्रीमान्‌ पं० शान्तिराजजी शास्त्री मेसूर का किमयं ततवार्थसूवग्न्थस्य मंगलश्छोकः १ शीपक वाला एक संस्कृत लेख प्रकाशित हुआ है। उस तेव म शास्रीजी ने “मोत्तमागंस्य नेतारं भेत्तारं कर्मभूतम्‌ । ज्ञातारं विध्वतत्तानां वन्‍्दे तदृगुण- लक्ष्यये ॥” इस मंगलशछोक को सूखकार उमास्वाति का सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। न्यायाचायजी का यह लेख उपो का खणड़नरूप दै । जिन विज्ञ पाठकों ने 'जैन-बोधक' में शास्त्रीजी के उपर्यक्त लेख को पढा है, उन्हें आचायेजी के इस लेख को भी अवश्य पढ़ लेना चाहिये । में आशा करता हूँ कि पझनुसन्धानप्रे मी अन्य विद्वान भी इस विषय पर अपना-अपना मत अवश्य प्रकट करेंगे ।-के० भुजबली शास्त्री




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