करुणा सतसई | Karuna Satsai

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Karun satsai  by जङ्गबहादुरसिंह - jadangbahadursingh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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वित्तीय संस्करण करुण सतसई के रचयिता स्वर्गीय श्री रामेश्वर 'करुण” फे जीवन ` -को लगावार २४ वर्पौ ठक मेंने निकट से देखा दै । मेरे सामने ही उनका साहित्यिक जीवन आरम्भ हुआ ओर मेरे ही सामने उन्होंने अपनी दृहत्नीला समाप्त की । श्रपने जीवन-काल में उन्होंने सदा अन्याय का विरोध तथा दक्षितों श्रोर पीड़ितों का समर्थन किया। बढ़ो-से-बढ़ो द्वानि उठा कर उन्होंने श्रपने विश्वास के अ्रनुसार श्रपने सिद्धान्तों की “रक्षा की | वस्तुतः वे एक महापुरुष थे उनकी श्रात्मा महान थी । करुण सतसई उसी मद्दान्‌ श्रात्मा की भाषा है; उसी अमर शआात्मा का श्रमर सन्देश दे । कवि को जहाँ भी कोई दोप दिखाई पढ़ा दे वहीं उसने ज़ोरदार शब्दों में उसे दूर करने के लिये आधवाज्ञ उठाई है। उसके लिये उसने जिसे जिम्मेदार समफा उसकी पूरी खवर जी ३-- “बह सरकार दो, नेता हो, अथवा स्वयं परमेश्वर टी कयो न हो । करुण जी का जीवन अत्यन्त संवर्षपूर्ण रहा है, थे बढ़े फर्मंठ स्वावलम्वी निर्भीक, साहसी ओर खरे व्यक्ति थे । आ्राजीविका या धनोपाजन को उन्होंने अपने श्रात्म-सम्मान के सामने कभी 'मह्व नहीं दिया ।, इसके _फल्रस्वरूप उन्हें चारम्बार जीविका के लिये एक स्थान को छोड़ कर दूसरे स्थान पर जाना पड़ा, पर जहाँ भी गये उन्होंने अपनी योग्यता के बत्च पर अपने लिये स्थान ছক निकाला | उनके शु्णो क कारण उनके विरोधी भी उनका दद्य से सम्मान करते थे ।




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