रात की बांहों में | Raat Ki Bahon Me

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : रात की बांहों में  - Raat Ki Bahon Me

लेखकों के बारे में अधिक जानकारी :

मोहन राकेश - Mohan Rakesh

No Information available about मोहन राकेश - Mohan Rakesh

Add Infomation AboutMohan Rakesh

राजेन्द्र यादव - Rajendra Yadav

No Information available about राजेन्द्र यादव - Rajendra Yadav

Add Infomation AboutRajendra Yadav

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
হই १३ कोशिदय करते हुए सोचा, “रात एक हसीन जादृगरनी है। हर शाम वह शहर की अपनी बाँटो से समेद्र लेती है और उस पर अपना सितारो-ढका कामदानी कर काला दुपट्टा डाल देती है और फिर सुवह हो ते तक धाहर की सारी कुरूपता, शहर के शरीर पर भलते हए भ॑ले, वदबरूदाट चीयडे, दार के हाथ-पाँव भीर चेहरे पर बून भौर पीप से रिसते हुए जल्म और नासूर --वे सब इस जादू के दुपटूटे से ढके रहते हैं। हर बुराई, हर बदसूरतो, हर बेइन्साफी, हर जुल्म पर अंधेरे का परदा पड़ा रहता है। और रात की निर्लिस्मी बाँहों में सिमटकर शहर के चेहरे पर निखार आ जाता है; शहर सुन्दर, जवान और स्वस्थ हो जाता है; रोशनी के लाखो दाँती की नुमाय्च करने के लिए पिलखिलाकर हंस पड़ता है। मगर फिर सुबह होती है! एक-एक करके रोशनियाँ चुकभती जाती है, जैसे किसी के चेहरे से खिसियानी टैंसी के आसार आहिंस्ता-आहिस्ता मिट जाते है-+और फिर सूरण अपना आग्नेय हाथ হালা है और एक ही वार में उस तिलिस्मी चादर को नोच लता है और शहर को रात्त की नरम बाँहों में ते घस्तीटकर वास्तविकता के ऋर उजाले में नगा ला खड़ा कर देता है ।***' “मगर, अर्जुन ते सोचा, अभी सवेरा होने मे देर है। इस ववत रात का पहला पहुर है और रात को बम्बई से उंयादा सुन्दर शहर दुनिया मे कोई नही है। ऐसा लगता है जैसे काली मखमल पर हीर-जवाहरात बिखरे पढें हो । मगर नहीं, यह सब तो कविता है!। उसने फिर सीचा, 'यह नीचे फैली হি কাজী মলম নী ই अंधेरा समन्दर है और ये हीरे-जवाहरात नहीं हैं। ये सठको, धघरो और दूकानी, दोदलो गर धिएटसे, बलवौं भौर नाचधरी, कारखानौ भौर फेवटपिया, चालो मौर भोएटियो को रोदानि है । नियोन लाइट में लिखें हुए मोटर और विस्कुटों, कपड़े की मिलो और साबुन की टिक्कियों और नाच-गानों से मरपुर फिल्‍मों के लाल, नीले, पीले रगो के इश्तहार हैं ।' देश के बंटवारे के बाद र उसने पन्द्रह वरद इसत शहर मे ग्रुज्ञारे थे। भौर दभ्वई की रात से वह इस तरह परिचित था, जेसे मरद अपनी औरत के शरोर की वीटी-बोटी से परिचित होता है) यह विसरो हुई रोशनियों का जाल, जो नीचे घूम বা আজে से: हर रोशनी दरसझी जादी:पहुचआरी,




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now