अलका | Alka

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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৪ में ओर तू. संकडो पाषाण न्ध स में से एक तू पापाण देता, न होती भात्रना फिर तू कहां भगवान्‌ होता। स्नेह के लघु दीप में में वत्तिक बनकर जली हूँ, तव चरण की कोर छूने अध्य जल बनकर हुली हूँ। में न यदि निज को मिटाती दूर क्या व्यवधान दोत्त, में न होती भावना फिर तू कहां भगवान होता। सात




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