उपनिषद का उपदेश | UPNISHAD KA UPDESH

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
11 MB
कुल पष्ठ :
318
श्रेणी :
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कोकिलेश्वर भट्टाचार्य - Kokileshwar Bhattacharya
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नन्दकिशोर शुक्ल - Nandkishor Shukla
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)লিপ পাপ পচअवतरणिका ` ঙसमझ पाते हैं। क्योंकि इदकी भपनी तो फोर सत्ता है नहीं प्रह्म सत्तामें ही' इनकी
लत्ता है। इसी को फद्दते है कारण-लत्ता। यह सत्ता खोकार किये पिता ब्रह्म 'ही
असत् द्वोजायगा १(ख ) हम वेदान्तद्शनमें सघसे पहले दो यातें देखते हैं। एक-परमार्थ हृष्टि
पर ; हि और इसरो-ध्यवदारिक द्वृष्टि । भिन्न २ द्विविध यजुभव होने से यद दो
চবি दृष्टि प्रवारकी दृष्टि फौ चात कदी गई है । सुतरां श्न षो प्रकार की
हृष्टियोंके पीचमें वास्तविक कोई विरोध नहीं 1 मश् या साधारण जन जिस भाषसे
इस जगत् का भनुभव करते हैं, उस का नाम व्यावहारिक दृष्टि, है। भौर तत्वज्ञा-
नी दार्शनिक परिडतगण जिस भाव से इस जगत् को जानते मानते हैं, उसका नाम
है 'परमार्थद्रृष्टि,! इस लिये दन दोषं कोई विरोध नदीं । दोनो $ वीच सामञ्जस्यं
स्पष्ट है।तत्वष्ञ व्यक्ति, इस नाम झुपात्मक जगत् में फेषल एक ब्रत्मसत्ता दी अनुस्यूत
देखते-हैं । सूर्य, चन्द्र, तरु लता,-फीट पतङ्क देदेन्द्रियादि-विधिध ओर असंख्य नाम
रूपात्मकं पदार्थो से ही यह जगत् दै । पर तस्यदं मदात्मा - इन सय वस्तुओं मे
फिसौ की भी 'खतन््त्र,-खाधोन सत्ता का अनुभव नहीं कर पाते । थे देखते हैं कि
सब पदार्थों में एक कारण सत्ता वा प्रह्मसत्ता दी ओत प्रोत हो रही है । इस फारणसदी घटशरायाद्या घिफ्रारास्तत्तराकृति: ।'''भाधारों सत्तिकाधेय भाकार-
श्रोभय॑~-घटः !' भारुलयाधासयोस्तुस्थं भागत्वं न मद् चिना । केवलारृतिमात्रः सन्
घटः फापि समीक्ष्यते” अनुभूतिप्रकाश, ३! १। १० “खाणावारोपिश्चौरः यथा शुदि
धरस्तथा | दविविधव्प्रवहारस्य सद्भावेऽपि विवेकिनः | सद्यायाम् शद तात्पर्य
नानृतेऽस्ति धदादिके । २। १६ ।२०९॥ रज्जु्द्यं यथा सपंधारादिष्वनुगच्छति । द्र
क्वप्तरवं तथा व्थोमवादयादिष्वञुगच्छति । ३।१३॥ “क्यमाकाशादिकं यडुपरपश्च'जगत्
कारणं परं बरहम । तस्मात् कारणात् परमार्थतः व्यतिरेकेण अभावः कार्यस्यावग-
स्पति” । वेदान्तभाष्य॥1२। १। १४ ।
.._ + यथा पुरोचर्तिनिभुजगाभावमनुभवन् विवेकी--“नास्ति भुजंगोरज्ज्रेपा
कर्थ वुयैच- विभेषीति”--प्रान्तमसिद्धाति । भ्रान्तस्तुलकीयापराधादेव मुज परि-
कर्य भीतः सन् पायते; न च तन्न विवेकिनो पचनं मददरा विरुध्यते । तथा
परमात्मकूटय्यात्मद्शन न्यवहारिकजनादि वचनेन अविरुद्धम् ।-माएड्क्यकारिका-
भाष्ये भानन्द्निरिः । ४।५७॥ तैः ( दतै: ) सर्वानन्यत्ात् आत्तैकदशनपक्षो न
चिसंध्यते । मार्ड्कयकारिफा भाष्य । ३। १७ | .
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