भारतीय शासन और राजनीति | Bharatiya Shasan Aur Rajniti
श्रेणी : राजनीति / Politics
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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
6 MB
कुल पष्ठ :
333
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)भारतीय सविधान का निर्माण ह
सर्वत्रयम, सविधान वे अवृच्छेद १ के अनुसार भारत एक सघ ( यूनियन )
है। भारतीय-सवियान में सपवाद वा सिद्धान्त प्रपनाया गया है, वयोवि इसम
राज्य वी तीनो प्रावश्यव्ताएँ निहित है, जो ये हैं. १-लिसित सविधान, २-सघीय
तथा राज्य सरकारों के मध्य शवितयो वा विभाजन, ३-संघ श्रौर राज्य सरकारों मे
मध्य शक्ति विभाजन, सविघान में उल्लेसित तीन सूचियों (प्र-सघ सूची, ब--राज्य
सूची भौर सन्समवर्ती सूची) के भ्राघार पर किया गया है ।
संघीय सूची में &७ विषय है, जिन पर सघ सरवार वा क्षेत्राधिवार है ।
राज्य सूची मे ६६ विपय है, जिन पर, साधारणतया राज्य सरवारो वा क्षेत्राधिवार
है । समवर्ती सूची में ४७ विषय हैं, जिन पर सघ तथा राज्य सरवारा यो विधि
निर्माण के लिए समवर्ती अ्रधिकार प्राप्त है, विन््तु यदि इस सूची में उल्लेसित
किसी वियय पर सवीब श्रौर राज्य कानून में सघर्ष है तो सघ षानून पो ही
मान्यता दी जावेगी । भ्रतएव यह स्प्ट है कि सघीय सरवार यो राज्य सरवारो वी
ग्रवेक्ष प्रधिर' शक्तियाँ प्राप्त है । इसके ग्रतिरिवत, वतिपय, विशेष परिए्िथतियों
में सधीय सरकार वो झोर झधिक' शक्तियाँ, जो राज्य सूची से सबधित हैं, प्राप्त
हो जाती है। इनका उल्नेप्त प्रत्य भ्रध्याय में विया गया है। प्रत, सधीय
विशेषताम्रों वे होते हुए भी मारतीय सविधान में एवत्मत प्रवृत्तियाँ निहित हैं ।
परन्तु मारत बा सविधान मुझ्यत सधीय सिद्धान्त परं प्राधारित है ।
द्वितीय, सरगार के स्वरूप वे दृष्टिकोण से भारतीय सविधान के भ्रन्तर्भेत
संतदात्मर' पद्धति वो प्रघनाया गया है। ससदात्मव पद्धति में वार्यपालिया के दो
प्रशार होते है, नाममात्र वी क्र्यपालिया जो राष्ट्राध्यक्ष के रूप मे, तथा वास्नवि
कार्ययालिका जो मश्री मण्डल के रूप मे होती है । मन्नी मण्डल या सामूहिक
रूप से ससद के निचले सदन के प्रति उत्तरदायी होना ससदात्मक पद्धति का मूल
सिद्धान्त है । भारतीय-स विवान के अनुच्छेद ७५ उपवस्ध (३) मे इस सिद्धान्त को
मान्यता दो गई है। सब के समान राज्यो के मत्री मग्डल भी पनुच्छेद १६४ (५)
के प्रनुत्तार सामूहित रूप से राज्य विधान-समा बे प्रति उत्तरदायी है। प्रत*
यह् सा है कि मारतीप-सविधान के भ्रन्तर्गत ससदात्मक' पद्धति को प्रपनायः
गया है ।
तृतीय, सविधान वे सशोवन के दृष्टिकोण से मारतीय-सविधान वा स्वरूप
कुछ मात्रा मे नमनीय है भोर कुछ मात्रा मे बठोर। मारतीय सविधान के विभिन्न
प्रावधानों मे सशोधन के दृष्टिकोण से उन्हे तीन भागों में विभाजित क्या जा
सकता है। प्रत्येश माग मे उत्तेखित सविवान के प्रावधानों वे सशोघन
कै लिए एक पृथक सगोवन प्रणतो है। सविवानकेये तीन माग निम्ना-
नुसार हैं .--
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