पांच बरस लम्बी सड़क | Pach Baras Lambi Sadak

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Pach Baras Lambi Sadak by शांता - Shanta

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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यात्री १प्र किसी भी ख्याल के मोटे कपड़े से मलकर उसे उतारू वह तब भी एक सीलन की पतली परत की तरह मेरे ऊपर जमा रहता है। रोज जम जाता है । महत किरपासागर जी से निजी तौर पर मुकते कोई शिकवा नहीं-- उन्होने श्रपने लिए श्राए चढावे में से हिस्सा निकालकर मुझे पाला है पढाया है सिर्फ शिकवा है तो उनके सागर होने से श्रौर श्रपने पात्र होने से । भी नही नफरत है । श्र यहीं नफरत उस मा नाम की झरत से है जिसने इस पात्र को भ्रस्तित्व दिया है । यह नफरत इस हृद तक है कि वह जब भी मत्दिर के दर्शन के लिए श्राती है मैं किसी बहाने मन्दिर से वाहर चला जाता हू । कभी वह सेरी कोठरी की दहलीज रोक ले श्रौर अपने पत्लू में बघी हुई श्रखरोट की मिरिया जबरन मेरे मृह में डाल दे तो उसकी पीठ सुड्ते ही मैं मुह में से वे गिरिया थूक देता हू । चाप नाम के मर्द को जव देखता हु--वह श्रपने वदा की रखवाली करता हुम्रा एक प्रेत-सा लगता है । किरपासागर जी के गाल सुक्ते दो लाल पके हुए फोडो की तरह लगते है जिनपर एकदम पुल्टिस वाघने का रुपाल झाता है चलती हुई जब एकदम सामने श्रा जाती है--वह मुक्ते पजो के बल चलती हुई वित्कुल एक बिल्ली लगती है जो श्रभी एक हे की गदन दवोच लेगी वाप--दुवला-पतला-सा श्रौर सिर को कन्घो के ऊपर एक बोभक-सा डालकर चलता हुग्रा मुझे खेतो मे गाडे हुए डरने की तरह लगता है आर मैं चिडियो-कौवो की तरह उससे डर जाता हू एक साधारण झ्राख से श्ञायद यह सब कुछ नहीं दिख सकता पर मुझे




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